गाजियाबाद एक ऐसा संसदीय क्षेत्र है जहां पर किसी भी चुनाव में मतदाताओं के मूड को भांप पाना बहुत मुश्किल होता है। यहां का मतदाता अपने पत्ते आखिरी समय तक नहीं खोलता है। इसी वजह से कोई भी दल या प्रत्याशी सीधे सीधे दावे करने से बचता है और कयास ही लगाए जाते रहते हैं। बहुत पुरानी बात नहीं करते। बीते विधानसभा चुनाव में गाजियाबाद सीट पर भाजपा से अतुल गर्ग, कांग्रेस ने सुशांत गोयल और सपा ने विशाल वर्मा को प्रत्याशी बनाया था। चुनाव में सुशांत गोयल ने धुआंधार चुनाव लड़ा था। मगर दूसरे स्थान पर विशाल रहे थे। इसी तरह मेयर चुनाव में बसपा उम्मीदवार पर्चा भरने के बाद प्रचार में नजर तक नहीं आई थीं मगर मतदाताओं का साथ उनको पूरा मिला था। सभी कयासों को झुठलाते हुए मेयर चुनाव में बसपा दूसरे स्थान पर रही थी। इससे थोड़ा पहले की बात करें तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के कमजोरी के कारण भाजपा की जीत तो तय मानी जा रही थी मगर वीके सिंह जीत का देश भर में रिकार्ड बना देंगे यह किसी ने सोचा भी नहीं था। मगर ऐसा हुआ। चुनाव हो और दल एवं प्रत्याशी जरत का दावा ना करें तो यह भी बेमानी होगी। आज भले ही भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सुभासपा आदि सभी दलों के प्रत्याशी अपनी जीत का दावा कर रहे हों। मगर मतदाताओं के मन में क्या है इस पर पक्का दावा कर पाना संभव नहीं है। गाजियाबाद का मतदाता प्रत्याशी का व्यक्तित्व भी देखता है, पार्टी की नीति भी देखता है, स्थानीय समस्याओं पर चर्चा भी करता है और राष्टï्रीय स्तर के मुद्दो को भी तरजीह देता है। राष्टï्रीय नेताओं की बात का मान रखना भी गाजियाबाद के मतदाताओं को अच्छे से आता है। इस चुनाव में कई चीजे हैं। भाजपा के लिए स्थानीय प्रत्याशी की मांग पूरी हुई है तो वीके सिंह का टिकट काटे जाने की नाराजगी भी है। रामलला प्राण प्रतिष्ठा की उमंग है तो एंटी इनकंबैंसी का डर भी है। कांग्रेस कुछ पाने के लिए लालायित है तो उसके पास बड़े चेहरे का अभाव भी है। हाथी किस तरह की चाल चलेगा इसका अभी इंतजार किया जाना ही बेहतर है।