ऐसा लगने लगा है कि गाजियाबाद में सरकारी संस्थाओं को यहां के निवासियों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। अधिकारियों को केवल व्यवसायिक हित की ही चिंता अधिक है। ऐसा नहीं होता तो यहां सरकारी संपत्तियों को लीज पर देने का प्रचनल नहीं चलता। आर्थिक रूप से कमजोर लोग अपने शादी, विवाह या अन्य पारिवारिक कार्यक्रम कम खर्च में और सुगमता से कर सकें, इसके लिए कम्यूनिटी सेंटर बनाए गए। कम आय वाले लोगों को इसका लाभ भी मिला। फिर अचानक इन कम्यूनिटी सेंटर को लीज पर दे दिया गया। कम्यूनिटी सेंटर मैरिज होम में तब्दील हो गए। दस या पन्द्रह हजार रूपए में मिलने वाले कम्यूनिटी सेंटर अब लाखों रूपए में मिलने लगे। कम आय वाले लोग फिर सडक़, पार्क में टेंट लगाकर अपने समारोह करने को मजबूर हो गए। फिर शहर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम बनाया गया। बताया गया कि इसमें कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी गतिविधियां की जा सकेंगी। शहर के कलाकारों को एक उचित सथान मिल पाएगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ नगर निगम ने ऑडिटोरियम को लीज पर दे दिया। अब भला जो आदमी लाखों रूपया नगर निगम को किराए का देगा वह क्यों किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए ऑडिटोरियम को सस्ते में या नो प्रोफिट नो लोस पर देने लगा। हद तो तब हुई जब नगर निगम ने ही किराया नहीं मिलने पर ऑडिटोरियम को सील भी कर दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गाजियाबाद में रहने वाले उत्तराखंड और पूर्वांचल समाज के लोगों को दो भवनों की सौगात दी। कहा कि यहां दोनों समाज के लोग अपनी संस्कृति, कला, लोककला को जीवित रखने के लिए कार्यक्रम कर सकेंगे। जाहिर सी बात है कि कला, संस्कृति के कार्यक्रम करने से बड़ा किराया तो मिलेगा नहीं। इसी बात को समझकर नगर निगम ने उत्तरांचल और पूर्वांचल भवनों को भी लीत पर देना तय कर लिया। मुख्यमंत्री की मंशा, लोगों की भावना से कहीं ज्यादा अधिकारियों को व्यवसायिक हित लगा। ज्यादा किराया वसूलने के लिए लोगों की भावना को कुचल दिया गया।