अगला गिरा पिछला होशियार कहावत होगी चरितार्थ
इसी कॉलम में मैंने लिखा था कि तीन राज्यों में भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत के बाद मुख्यमंत्रियों को लेकर रिवाज बदलने वाला है। कल भी यही लिखा था। ये रिवाज बदलना भाजपा का एक नया प्रयोग है। अब ये कितना सफल होगा ये भी देखने वाली बात है। राजस्थान में जिस तरह पहली बार विधायक बने भजनलाल शर्मा को प्रदेश की कमान सौंपी गई है ये भी कम चौंकाने वाला फैसला नहीं है। इस फैसले से ये बात भी साफ हो गई है जो अब तक कहा जाता था कि भाजपा पुराने कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान देती है ऐसा भी अब नहीं होगा। आज की भाजपा पूराने और नये को भूल गई और जो उसको सही लगा अब वो वही कर रही है। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि पहली बार विधायक बने व्यक्ति को राज्य का मुख्यमंत्री भी बनाया जा सकता है। अब मुख्यमंत्री बनने के लिए किसी लंबे अनुभव की भी जरूरत नहीं होगी, ऐसा अहसास भी भाजपा हाईकमान ने करा दिया। जाहिर है कि इस फैसले के बाद ये बात भी आईने की तरह साफ हो गई कि चाहे राज्य का मुख्यमंत्री हो या फिर केंद्र का कोई कैबिनेट मिनिस्टर वो केवल दिल्ली के दो बड़े नेताओं की बदौलत ही अपना काम करेगा। इसके लिए कोई लंबे चौड़े अनुभव की अब जरूरत नहीं है जिसको दिल्ली के दो बड़े नेताओं का आशीर्वाद मिल गया जाहिर है फिर वो आशीर्वाद के बल पर राज्य भी चला सकता है और अपनी केंद्र के मंत्री के रूप में मंत्रालय भी चला सकता है। अब तक यह कहा जाता था कि फलां विधायक या फलां सांसद या फलां मंत्री को इतना अनुभव नहीं है कि उन्हें किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जा सकता। भजन लाल शर्मा के बाद ये बातें भी अब बेमानी हो गई। हालांकि इस प्रयोग से भले ही पुराने और समर्पित नेताओं को झटका लगा हो लेकिन जो नये नेता है उनके अंदर उम्मीद भी जागी कि अब कोई लंबे अनुभव या लंबा समय पार्टी में सेवा करने से कुछ नहीं मिलता। अब अगर पहली बार भी किसी सदन के सदस्य बने हैं तो मंत्री भी बन सकते हैं और मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं। ये भी हकीकत है कि दिल्ली के दो बड़े नेताओं के फैसले के आगे किसी के बोलने की हिम्मत नहीं है। राजस्थान में जिस तरह वसुंधरा राजे सिंधिया रोज विधायकों को बुलाकर प्रेशर पॉलिक्टिस कर रही थी उसका भी कोई असर भाजपा हाईकमान पर नहीं हुआ और जो उन्होंने तय किया था वही हुआ। देश के बड़े कद्दावर नेता और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को राजस्थान भेजने के पीछे भी बहुत बड़ी रणनीति थी। बहरहाल भाजपा के नये प्रयोग से चाहे वसुंधरा हों, शिवराज हों, या रमन सिंह हों सब अंदरखाने उदास हैं, मायूस हैं, खून के आंसू पी रहे हैं लेकिन सब बेबस नजर आ रहे हैं। अब इसे पार्टी का अनुशासन कहें या कुछ और इसका फैसला तो आप खुद ही कर सकते हैं। यहां यह भी काबिलेगौर है कि इस नये प्रयोग से दिल्ली के दो बड़े नेताओं को ऐसे लोगों को भी संकेत दिया है जो अपने आप में दिल्ली वालों के समकक्ष अपने को समझने लगे थे उनको भी अहसास कराया है कि वे कुछ भी फैसला ले सकते हैं क्योंकि यह हकीकत है कि आज भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर चढक़र बोल रहा है और इसी का प्रमाण है मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को प्रचंड बहुमत। तमाम सर्वे धरे के धरे रह गये और मोदी का जादू चल गया। इस प्रयोग से ये कहावत भी चरितार्थ हो गई है कि अगला गिरा और पिछला होशियार हो गया। अब जो लोग अपने आपको दिल्ली के बड़े नेताओं के बराबर समझ रहे हैं उन्हें भी बहुत ही फूंक-फूंकर चलना होगा तभी बात बनी रहेगी वरना नये प्रयोग के बाद किस राज्य में इस नये प्रयोग को लागू कर दिया जाये कुछ कहा नहंी जा सकता। जय हिंद