नगर निगम बोर्ड की अंतिम बैठक में वरिष्ठ पार्षद अनिल स्वामी द्वारा जिस तरह नगर निगम में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं उसकी जांच तो होनी चाहिए। क्योंकि, एक वरिष्ठ पार्षद द्वारा सीधे तौर पर कमिशन लेने की बात कही गई है। यह अपने आप में बहुत गंभीर है। उन्होंने बाकायदा प्रतिशत तक बताया और कई अन्य पार्षदों ने भी हां में हां मिलाई। अब इन आरोपों के पीछे कितनी सच्चाई है, इसलिए जांच जरूरी है। हालांकि पांच साल तक पार्षद महोदय भी खामोश क्यों रहे यह भी सवाल है। उन्होंने अंतिम बैठक में ही इस तरह के आरोप क्यों लगाए। इन पांच वर्षों में कई नगर आयुक्त रह चुके हैं, तो क्या यह कमिशनखोरी अभी शुरु हुई है यह भी सवाल है। या मौजूदा नगर आयुक्त डॉ. नितिन गौड़ जिनकी ईमानदार छवि है और वह सही को सही कर रहे हैं। उन्होंने कई ऐसी फाइलें खोली हैं जिसमें कहीं ना कहीं निगम के अधिकारी, पार्षद का गठजोड़ सामने आया है तो क्या नये नगर आयुक्त पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। इतना ही नहीं सीनियर पार्षद द्वारा कमिशनखोरी का सीधा आरोप लगाने से कई और भी सवाल भी खड़े हो गए हैं। यदि इतना कमिशन चल रहा है तो फिर महापौर कैसे खामोश हैं यह भी सवाल है। आखिरकार क्या महापौर को ये कमिशनखोरी दिखाई नहीं दी और पार्षद अनिल स्वामी ने भरे सदन में इस कमिशनखोरी का खुलासा किया ये भी बड़ा सवाल है। बात केवल आरोप तक नहीं रहनी चाहिए भरे सदन में यह मामला उठा है, अखबारों में छपा है और जनता में क्या संदेश जायेगा ये भी बड़ा सवाल है। निगम में भाजपा की मेयर हैं, भाजपा का बहुमत है और अगर भाजपा के राज में कमिशनखोरी बड़े पैमाने पर हो रही है तो फिर इसकी जवाबदेही किसकी है? निगम के चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में निगम में भ्रष्टाचार के आरोप क्या विपक्ष के लिये चुनावी मुद्दा नहीं बनेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोप कोई विपक्ष नहीं लगा रहा है, बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लगातार २५ साल से पार्षद चुने जाने वाले अनिल स्वामी लगा रहे हैं। वह भाजपा के वरिष्ठ नेता ही नहीं, बल्कि महापौर के भाई भी हैं। ऐसे में उनके द्वारा लगाये गए आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसलिए इन आरोपों की जांच जरूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो और जनता के सामने सही तस्वीर आये। नगर निगम सदन शहर की सरकार होती है और शहर के लोग अपने वोट से पार्षद चुनकर सदन में भेजते हैं, इसलिए जांच जरूरी है।
– जय हिन्द।