रोहित शर्मा
गाजियाबाद। सियासतदारों के जहन अक्सर गलतफहमी के शिकार रहते हैं। वे समझते हैं कि जनता को उंगलियों पर नचाना उनके बाएं हाथ का खेल है। नेता ये नहीं जानते कि जब जनता अपना खेल खेलती है तो लेने के देने पड़ जाते हैं। जनता जनार्दन की आंधी चलती है तो हवाई मंसूबो को धराशाई होने में देर नहीं लगती। खादी धारियों के जहन पर जमी गलतफहमी की मिट्टी एक पल में हट जाती है। सियासत को अपनी विरासत समझने वाले कब अर्श से फर्श पर पटक दिए जाते हैं कुछ पता नहीं चलता। बीता विधानसभा चुनाव भी कई नेताओं की दिमागी दशा को आईना दिखा गया है। यह चुनाव बता गया है कि वे अपने बाप-दादा की संपत्ति के मालिक तो हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक विरासत शहर की जनता तय करती है।
दरअसल, हम बात देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस कभी देश और प्रदेश पर राज किया करती थी। एक जमाने में यूपी में भी कांग्रेस का सिक्का चला है। किसी जमाने में कांग्रेस का टिकट जीत की गारंटी माना जाता था। बदलते वक्त के साथ आज कांग्रेस उत्तरप्रदेश में बेहद कमजोर साबित हो रही है। ऐसे में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज करने के लिए पार्टी को मिलने वाली वोटों के अलावा अपनी व्यक्तिगत छवि होना भी बेहद जरूरी है।
व्यक्तिगत साख और पार्टी का साथ ही कांग्रेस के प्रत्याशी के लिए आज जीत की गारंटी बनता है। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि सियासत आपको विरासत में मिली है। विरासत में मिली सियासत कितनी मजबूत है इसे शहर की जनता ही अपनी कसौटी पर कसती है। हां, कांग्रेस ऐसी पार्टी जरूर है जो अपने नेताओं को पूरी शिद्दत के साथ चुनाव लड़ाती है। पार्टी के उम्मीदवारों को फंड से लेकर सामग्री देने तक का ख्याल पार्टी हाईकमान रखता है। कई दावेदार तो ऐसे होते हैं जो पार्टी की ओर से मिलने वाले फंड के फंडे में फंसकर चुनाव मैदान में उतरते हैं। गुणा-भाग लगा लेते हैं कि पार्टी से मिलने वाली सहायता राशि और बाजार से जुटाए गए चंदे के बाद यह सौदा घाटे का नहीं होगा। कांग्रेस में एक कहावत यह भी है कि चुनाव लडऩे वाले नेताओं की एक मंजिल चुनावी दौर में और ऊपर की ओर बढ़ जाती है।
बात फिलहाल चुनाव की करी जाए तो जनपद में कांग्रेस के पांच प्रत्याशी जमानत जब्त कराकर घरों में बैठे हैं। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, उत्तर प्रदेश में अधिकतर कांग्रेस के उम्मीदवारों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। हां, जो हमारे जनपद में हो रहा है वो हाल शायद ही किसी दूसरे जनपद में कांग्रेसियों का हुआ हो। यहां कांग्रेसियों को पार्टी ने चुनाव लडऩे के लिए मोटा फंड मुहैया कराया। चर्चा है कि चुनाव में पार्टी का फंड और चुनावी चंदा मिलाकर मोटी रकम की गठरी बनाई गई। हां, चुनाव होने लगभग ढाई महीने बीत जाने के बाद भी ये चुनाव का कर्ज नहीं उतार सके हैं। खबर है कि एक कैंडिडेट के घर पर तो टैक्सी-ऑटो वालों को धरना तक देना पड़ा। बात हलक में आकर अटकी जब कहीं जाकर टैक्सी वालों का का हिसाब हुआ।
अब बात सियासी धमक की करी जाए तो चुनाव के दौर में लाव लश्कर के साथ चलने वाले नेताजी फिलहाल अकेले नजर आते हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने के लिए अपने साथियों को फोन करते हैं तो वे भी साथ चलने में कन्नी काट लेते हैं। सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों में अकेले चलना इनकी पहचान बन गई है। जनता ने बता दिया है कि सियासत का यह खेल उनके बिना नहीं चलता। जनता ही नेताओं कहानी लिखती है, वो ही उनकी कथा का पटाक्षेप भी कर देती है।