भारतीय जनता पार्टी ने सबसे पहले और कांग्रेस ने उसके बाद गाजियाबाद से लोकसभा प्रत्याशी घोषित चुनाव में एक कदम आगे बढ़ा दिया था। तब बहुजन समाज पार्टी पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बन चुका था। ऐसे में राजनीतिक पंडित अपनी पोथी लेकर बताने लगे थे कि बसपा से कोई ठाकुर प्रत्याशी बनाया जा रहा है। किसी ने एक भाजपा नेता को पाला बदलने को बेकरार बताया था। लेकिन बसपा ने तमाम कयासों को झुठला दिया है। बसपा ने पंजाबी समाज के एक उद्योगपति पर दांव खेला है। नगर निगम चुनाव में मेयर पद पर बसपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर था। वह भी तक जब बसपा के मेयर उम्मीदवार ने नाम मात्र का भी चुनाव प्रचार नहीं किया था। लेकिन यह भी सच है कि नगर निगम मेयर चुनाव और लोकसभा सांसद चुनाव में बहुत फर्क है। नगर निगम चुनाव स्थानीय मुद्दो पर लड़ा जाता है। यह गली मुहल्ले का चुनाव होता है। लेकिन लोकसभा चुनाव राष्टï्रीय मामलों का चुनाव है। सभी दलों के राष्टï्रीय नेता इसमें शामिल होते हैं। बड़े नेताओं का मान सम्मान लोकसभा चुनाव से जुड़ा होता है। इसीलिए इसे लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है। खैर बात गाजियाबाद की करते हैं। यहां भाजपा ने अतुल गर्ग को टिकट दिया है जो वर्तमान में गाजियाबाद सीट से विधायक हैं। वह दो बार के विधायक हैं और कुल तीन चुनाव लडऩे का उनको अनुभव है। कांग्रेस ने डौली शर्मा को उम्मीदवार बनाया है। डौली शर्मा को भी दो चुनाव लडऩे का पूरा अनुभव है। अब बसपा से जो उम्मीदवार सामने आ रहा है उसको चुनाव का अनुभव कम है। हां यह माना जा सकता है कि बसपा के कैडर वोट के जरिए उसे मुकाबले से बाहर नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस उम्मीदवार डौली शर्मा के समाने फिलहाल ज्यादा विकल्प हैं। अगर कांग्रेस उम्मीदवार सही रणनीति से चुनाव लड़ती हैं, एंटी इंनकैंबसी को भुनाने में सफल हो जाती हैं तो उनके पास इतिहास बदलने का मौका है। सच यह भी है अभी चुनाव प्रबंधन में भाजपा कांग्रेस से तीन कदम आगे है। जिस काम के बारे में कांग्रेस सोचना शुरू करती है उसे भाजपा पहले ही कर चुकी होती है।