सुब्रत भट्टाचार्य
गाजियाबाद। क्या एक पार्टी के तौर पर भाजपा बदल गई है? एक ऐसी पार्टी जिसके बारे में वरिष्ठ नेता दावा करते हैं पार्टी विद एक डिफरेंस यानि एक अलग तरह की पार्टी जिसमें सिर्फ सिद्घांतों को महत्व दिया जा ता है। भाजपा में अक्सर यह कहा जाता है कि यह एक कार्यकर्ता आधारित पार्टी है। यहां परिवारवाद नहीं है। यहां व्यक्ति को नहीं पूजा जाता है, बल्कि राष्टï्र को पूजा जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, या यूं कहे कि जब से दूसरे दलों से लोग यहां आए हैं, पार्टी की संस्कृति बदल सी गई है।
पहले जहां सिद्घांतों और सरल और सादा जीवन शैली को महत्व दिया जाता था, आज वह बदल गया है। आज शानो शौकत और कॉरपोरेट जैसी संस्कृति भावी होती जा रही है, कम से कम गाजियाबाद और इसके आसपास के जिलों में। आप किसी भी पुराने भाजपा कार्यकर्ता जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी पार्टी के लिए खपा दी है, उनके रहन सहन और चालढाल देखिए और आज के कार्यकर्ता, जो सिर्फ इसलिए पार्टी ज्वाइन की है कि जल्द से जल्द उनको नेता बनना है, पदाधिकारी बनना है, जनप्रतिनिधि बनना है, उनके चाल ढाल देखिए तो पार्टी में आए बदलाव का पता लग जाएगा।
गाजियाबाद में पिछले दो महीनों से प्रकोष्ठों और विभागों की नियुक्तियां चल रही है। दावा किया जा रहा है कि सभी विभाग और प्रकोष्ठों की नियुक्तियां पूरी हो गई है लेकिन बीच-बीच में सोशल मीडिया पर नामों की लिस्ट आ ही रही है। युवा मोर्चा की लिस्ट को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि इस लिस्ट की शिकायत ऊपर तक की गई है। जिन्हें जगह नहीं मिली, उन्होंने सोशल मीडिया पर कई तरह के इल्जाम लगाए। कहा गया कि नियुक्तियां करने में पैसों का खेल चला। इस बीच यह भी चर्चा रही है कि युवा मोर्चा के कई पदाधिकारी तो युवा हैं भी नहीं। वे युवा होने की आयु को पार कर चुके हैं। कुछ इसी तरह की चर्चाएं किसान मोर्चा को लेकर भी हो रही है।
कहा जा रहा है कि किसान मोर्चा के लिए 270 से ज्यादा नाम थे। ऐसे में उनमें किस का चयन किया जाए, यह एक बड़ी चुनौती रही है। जिसकी जितनी तगड़ी पहुंच और जिसने ‘पांव लागीÓ की है, उनकी बल्ले-बल्ले हो गई है। सोमवार को महानगर अध्यक्ष संजीव शर्मा का जन्म दिन था। हालांकि भाजपा में पदााधिकारी का सार्वजनिक तौर पर जन्मदिन मनाने की परपंरा नहीं है, फिर भी महानगर अध्यक्ष इतने ‘लोकप्रियÓ है कि कार्यकर्ताओं ने उनके जन्मदिन पर एक मैरिज हॉल बुक किया और पूरे दिन बधाई का सिलसिला चलता रहा। महानगर अध्यक्ष को बधाई देने के लिए सभी प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में होड़ सी लगी रही। सोशल मीडिया पर जन्मदिन की तस्वीरें ही छाई रही। जो नहीं पहुंच पाए उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए महानगर अध्यक्ष को जन्मदिन की बधाई दी।
इस बीच चर्चाओं का बाजार भी गर्म रहा। भाजपा में ही बड़े स्तर पर जन्मदिन मनाने के तरीकों को लेकर चर्चाएं होती रही। कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि ऐसे वक्त कोरोना की दूसरी लहर से हर दूसरे परिवार में मौत हुई हो और संक्रमण की तीसरी लहर से इनकार नहीं किया जा सकता है, तो इतने भव्य तरीके से, इतनी भारी संख्या में लोगों के साथ जन्मदिन मनाने पर सवाल उठना लाजिमी है। खुद पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री एवं दूसरे बड़े नेता कोरोना के कारण सार्वजनिक कार्यक्रमों से बच रहे हैं। इस बार 17 सितंबर को प्रधानमंत्री के जन्मदिन को भी भाजपा ने सेवा के रूप में सादगी से मनाने का निर्णय लिया।
जाहिर है जितने मुहं उतनी बातें। भाजपा में आए इस बदलाव से वे कार्यकर्ता दुखी हैं, जिन्होंने अपने पसीने की मेहनत से पार्टी को इस स्थान तक ले आए हैं। उनका दुख होना स्वाभाविक है। संघ की शाखाओं में रहकर पूरा जीवन समाज और देश के हित के लिए कार्य किया, कभी अपने या अपने परिवार के लिए नहीं सोचा। लेकिन आज के कार्यकर्ता सिर्फ पद और शोहरत पाने के लिए आडंबरों का सहारा लेकर आगे बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि भाजपा अब दूसरे दलों से अलग नहीं रह गई है।