लोकसभा चुनाव-२०२४
लोकसभा चुनाव २०२४ के दूसरे चरण के बाद जिस तरह की बयानबाजी चुनावी मंचों से हो रही है उससे अब लोग ऊब गये हैं। २०१४ के बाद अगर टीवी पर बड़े नेताओं के भाषण आते थे खासकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तो लोग बिल्कुल साइलेंट होकर पूरा भाषण सुनते थे। इतना ही नहीं बच्चे घर में शिनचेन और डोरी मोन भी देखते होते थे तो घर के लोग सख्ती के साथ मना करके केवल और केवल भाषण सुनते थे। जाहिर है एक विजन के साथ २०१४ में भाजपा आयी थी और काफी हद तक जो वायदे किये थे वो पूरे भी किये। मतलब भाषण सुनने बड़ा क्रेज था। २०१९ में कुछ यही स्थिति रही। गैरभाजपाई दलों के नेताओं के भाषण अगर होते थे तो लोग चैनल बढ़ा दिया करते थे और मोदी जी बोलते थे तो घर बूढ़े, युवा और महिलाएं टीवी पर आंखे गड़ाकर पूरा भाषण सुनते थे। अब २०२४ में जिस तरह की भाषणबाजी हो रही है उससे लोग उक्ता गये हैं और अब बच्चों को आजादी है कि वे शिनचेन भी देखे और डोरी मोन भी। अगर बच्चे खुद कहते है कि पापा आप न्यूज देख लो या चुनावी भाषण सुन लो तो पापा कहते हैं बेटा अब तुम शिनचेन देखते रहो। दरअसल जिस तरह के चुनावी भाषण हो रहे हैं इस तरह के भाषणों की उम्मीद कम ही थी। राहुल गांधी ने अमेठी के बदले रायबरेली से पर्चा क्या भरा भाजपा के हर छोटे से बड़े नेता का बयान कल दिन भर चैनलों पर छाया रहा। कोई कह रहा भाग राहुल भाग, कोई कह रहा भागो मत, डरो मत, कोई कह रहा है 21वी बार भी राहुलयान की यात्रा विफल होगी। ये किस तरह की भाषणबाजी है। लोकतंत्र में सभी को चुनाव लडऩे हक है वो कहां से लड़े इसका फैसला पार्टी का हाईकमान करता है। जनता उसको जिताती है या नहीं जिताती है ये फैसला भी वोटों से होता है। किसी को भागने की बात करना, किसी यात्रा विफल करना जैसा बयान इस तरह के बयानों की उम्मीद चुनाव में नहीं की जा रही थी। आज स्थिति ये है ना कोई विकास पर बात कर रहा है और ना कोई इस बात पर बात कर रहा है कि देश को कैसे आगे लेकर जाया जाए। कांगे्रस के पास तो कोई विजन दिखाई नहीं दे रहा है और ना कोई प्रधानमंत्री का चेहरा अभी तक उन्होंने घोषित किया है। भाजपा के पास जरूर विजन भी है और प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जैसा चेहरा भी है तो फिर इस तरह की बयानबाजी भाजपा खेमे से क्यों की जा रही है ये बड़ा सवाल है। इससे पहले भी मैंने लिखा था कि क्या भाजपा को कांगे्रस कोई दम दिखाई दे रहा है। जो हर मंच पर केवल और केवल कांगे्रस पर निशाना है और राहुल गांधी को शहजादा कहकर पुकारा जा रहा है। भाजपा खेमे के बयानों से और भाषणों से तो यही लगता है। बहरहाल, लोकतंत्र में सभी चुनाव लडऩे का हक है कोई कहीं से भी लड़े वो उसकी पार्टी का फैसला होता है। हार-जीत का फैसला जनता की अदालत में होता है। नेताओं को चाहिए कि वो ऐसे भाषण दे, ऐसा संबोधन करें जिससे युवा पीढ़ी को कुछ सीखने का मौका मिले और फिर लोग बच्चों से कहे कि हमें नेताजी का भाषण सुनना और आप गेम और टीवी बाद देखना। क्योंकि पहले जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था तब लोगों ने रेडियो के माध्यम से संबोधन करके देश में क्रांति पैदा की थी। भाषणों से बहुत कुछ बदला जा सकता है। जरूरत इस बात है कि हम बांटने वाला नहीं एक दूसरे को जोडऩे वाला भाषण दें और युवाओं को भी नई सीख मिले। चुनाव में हार-जीत होना अलग बात है। राजनेताओं के भाषण बहुत कुछ माहौल बदल सकते हैं इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए राजनेताओं पर भी जिम्मेदारी है कि वे विजन के साथ अपना संबोधन करे ताकि हमारा भारत और मजबूत हो। जय हिंद