गाजियाबाद से टिकट बदला तो
भाजपा द्वारा पहली सूची और दूसरी सूची में गाजियाबाद मेरठ सहित कई लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार घोषित नहीं किये जाने से असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है। सबसे ज्यादा चर्चा गाजियाबाद की सीट को लेकर है। क्योंकि यहां पर स्थानीय के बदले बाहरी उम्मीदवार को चुनाव लड़ाया जा रहा है। ये परम्परा काफी टाइम से चल रही है। स्थानीय नेताओं ने तो अब उम्मीद ही छोड़ दी है। गाजियाबाद के बेचारे हमारे समर्पित कार्यकर्ता पूरे जीवन कुर्सियां बिछाते रहे लेकिन एक दशक से उन्होंने उम्मीद ही छोड़ दी है कि उन्हें मौका मिलेगा। अब दस साल से जनरल वीके सिंह गाजियाबाद से सांसद हैं और हर कार्यकर्ता से वो रूबरू हो चुके हैं और उन्हें नाम से जानते हैं। अब कार्यकर्ता भी इस बात को लेकर बहुत खुश है कि जनरल वीके सिंह भी उन्हें पहचानने लगे हैं और अब परिचय की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन गाजियाबाद का टिकट होल्ड होने के बाद फिर बाहरी लोगों के नाम चल रहे हैं। गाजियाबाद के समर्पित कार्यकर्ताओं ने युग करवट के साथ अपना दर्द साझा किया और कहा कि यदि जनरल साहब का टिकट कटता है और फिर कोई बाहर से आता है तो हमें फिर पांच साल तक बाहर से आने वाले नेता को बताना पड़ेगा कि हम भी भाजपाई हैं। मतलब परिचय देते-देते पांच साल गुजर जाएंगे। दर्द वास्तव में सही है, स्वाभाविक है। जिस गाजियाबाद ने लगातार चार बार रमेशचंद तोमर को सांसद बनाया। हालांकि वो भी बाहर से आये थे लेकिन चार बार सांसद बनने के बाद वो पूरी तरीके से स्थानीय ही हो गये हैं। रमेशचंद तोमर उस समय सांसद रहे जब गाजियाबाद लोकसभा गढ़मुक्तेश्वर तक थी। उसके बाद भी रमेशचंद तोमर एक-एक कार्यकर्ता का नाम जानते थे, एक ग्राम प्रधान का नाम जानते थे और सभी के दुख-सुख में बराबर शरीक होते थे। इसलिए कार्यकर्ताओं को भी उनको बार-बार जिताने में कोई फर्क नहीं पड़ता था। गाजियाबाद की जनता ने उस समय रमेशचंद तोमर को चार बार जिताया जब कहीं कोई आंधी भाजपा की नहीं थी। आज तो स्थिति ये है कि किसी को भी खड़ा कर दो वो चुनाव जीत जाएगा। मतलब आज भाजपा का टिकट एक तरह से जीत का सर्टिफिकेट है। ऐसे गाजियाबाद में भाजपा कार्यकर्ताओं को बार-बार परिचय देना पड़े कितना बड़ा दुर्भाग्य है। जब तक गाजियाबाद में नाम घोषित नहीं हुआ है नये-नये नाम सामने आ रहे हैं। रामायण में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल का नाम मेरठ के साथ-साथ गाजियाबाद से भी चल रहा है। वैसे संगठन महासचिव अरुण सिंह के साथ अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय अध्यक्ष सतेन्द्र शिशौदिया का नाम भी खूब चर्चाओं में है। बहरहाल देखा जाए तो ये सीट ब्राह्मïण सीट है लेकिन इसे ठाकुर सीट बना दिया गया है। इसी वजह से लगातार ठाकुर उम्मीदवार यहां से किस्मत आजमा रहे हैं। बहरहाल अब देखना होगा कि क्या फिर गाजियाबाद के कार्यकर्ताओं को अपना परिचय पांच साल तक देना होगा या फिर गाजियाबाद की जनता जो जनरल वीके सिंह को चाहती है, भाजपा हाईकमान जनरल वीके सिंह के एक बार फिर गाजियाबाद से मौका देगा लेकिन लोग अब यही कह रहे हैं ‘इंतहा हो गई इंतजार की आईना कोई खबर मेरे यार की।’ जय हिंद