प्रमुख संवाददाता
गाजियाबाद (युग करवट)। नगर आयुक्त महेंद्र सिंह तंवर के तबादले की टाइमिंग को लेकर अब बहस छिड़ गई है। कई लोगों का कहना है कि वैसे तो शासन किसी भी अधिकारी का कभी भी तबादला कर सकता है, लेकिन नगर आयुक्त महेंद्र सिंह तंवर अगर गाजियाबाद में और छह से आठ महीने रहते तो शहर सुविधाओं के मामले में और स्मार्ट तो होता ही, साथ गाजियाबाद यूपी का पहला ऐसा शहर होता जो कचरा फ्री हो जाता। शासन ने जो भी किया वह अच्छा सोच कर ही किया होगा, मगर तबादले की टाइमिंग को लेकर काफी सवाल उठ रहे हैं।
कई ऐसे पार्षद हैं जो नगर आयुक्त के तबादले के टाइमिंग को लेकर खुश नहीं हैं। पार्षद राजेन्द्र त्यागी का कहना है कि शहर में कूड़ा निस्तारण से लेकर वेस्ट मैनेजमेंट पॉलिसी तक सभी सुविधाएं और शिकायत करने के प्लेटफॉर्म को डिजिटल तैयार करने से लेकर तमाम ऐसी योजनाएं हैं जिनको शुरू किया जाना था। उनका कहना है कि जो नए नगर आयुक्त आ रहे हैं उन्हें नगर निगम का वर्क समझाने में काफी वक्त लगेगा। इससे जो कार्य नगर आयुक्त महेंद्र सिंह तंवर द्वारा शुरू किए गए हैं, वे काफी धीमीगति में चले जाएंगे या फिर उनके अटकने की संभावना है।
नगर आयुक्त तंवर कुछ और समय गाजियाबाद नगर निगम में रुक जाते तो काफी अच्छा होता। शहर में बेसिक सुविधाओं और उनका मैनेजमेंट और भी बेहतर होता। इसी क्रम में पार्षद मनोज चौधरी का कहना है कि शासन को चाहिए था कि नगर आयुक्त महेंद्र सिंह तंवर का तबादला रोक दे। दरअसल जिन योजनाओं पर नगर आयुक्त काम कर रहे थे, वह कार्य उस गति से नहीं होंगे जिससे हो रहे थे। वह सभी काम आम जनता से जुड़े हुए है। उनकी मांग है कि शासन को चाहिए कि वह नगर आयुक्त महेंद्र तंवर का तबादला रोक दे। नगर निकाय चुनाव के बाद वह तबादले के बारे में सोचे।
एसपी पार्षद दल नेता मौ. कल्लन का कहना है कि नगर निगम में कई स्मार्ट योजनाओं पर कार्य चल रहा था। नगर आयुक्त के तबादले से उन योजनाओं को झटका लगेगा। उनका कहना है कि कुछ लोग नगर आयुक्त को शहर में विकास कार्य नहीं करने के लिए उन्हे निशाना बना रहे थे। उनका मानना है कि जब शासन निगम का 500 करोड़ रुपया लिए बैठा है तो नगर आयुक्त के बदलने से विकास कार्य कैसे हो जाएंगे।