टिकट के लिए लगवाए जुगाड़… हार की जिम्मेदारी लेगा कौन?
रोहित शर्मा
गाजियाबाद। जिला पंचायत चुनाव में परिणाम में कांग्रेस का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो चुनाव लड़ाए जाने के दौरान ही लगभग तय हो गया था। बाकी की कसर विधिवत आए परिणामों ने पूरी कर दी है। जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो चुका है। 14 वार्डों में से आठ पर समर्थित प्रत्याशी देने वाले कांग्रेस के नेता और संगठन आज इस हार पर मौन हैं…हार की जिम्मेदारी लेने को पार्टी का कोई सफेदपोश तैयार नहीं है। हां, चुनाव में जब प्रत्याशी घोषित किए जा रहे थे, तब जरूर टिकट कटवाने का खेल कांग्रेसी नेता खेल रहे थे। सिफारिशों के लिए जुगाड़ लगवाए गए थे। अब कांग्रेस में ही इस बात को लेकर चर्चा है कि जो टिकट का जुगाड़ लगाने के दौरान दमखम दिखा रहे थे, वे आज कहां गायब हो गए हैं? सामने आकर क्यों नहीं बताते कि इस करारी हार की जि़म्मेदारी आखिर किस के सिर पर जाती है।
जिला पंचायत चुनाव के लिए जब राजनीतिक दल समर्थित प्रत्याशी तय किए जा रहे थे तो कांग्रेस में दूसरा ही खेल चल रहा था। दूसरे दल जहां जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश कर रहे थे वहीं कांग्रेस में सामने वाले गुट को नीचा दिखाने के लिए रणनीति तैयार की जा रही थी।
एक वार्ड में तो घमासान की स्थिति पैदा हो गई थी। सभी को याद होगा कि संगठन की ओर से मुरादनगर के एक वार्ड में प्रत्याशी का नाम लगभग तय कर दिया गया था। इसी दौरान एक ऐसे नाम की एंट्री हुई जो कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस के कुछ महानुभावों के साथ नजर आए थे। पार्टी में नए आए नेता को पार्टी के समर्थन का टिकट दिलाने के लिए पूरा जोर लगा दिया गया। आखिरकार गुट इस रस्साकशी के खेल में कामयाब हुआ और तलवार कार्यकर्ता की गर्दन पर चल गई। मैदान में कांग्रेस में नए आए खिलाड़ी को उतार दिया गया। खैर, चुनाव के दौरान में जीत की तलाश में ऐसा ही होता रहता है।
अब जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस के सभी प्रत्याशी ढेर हो चुके हैं। पंचायत चुनाव में मिली करारी हार के बाद अब कांग्रेस के गु्रप और सोशल मीडिया पर भी चर्चाओं और आलोचनाओं का बाजार गर्म हो गया है। चर्चाओं में कांग्रेस के आम कार्यकर्ता पार्टी के नेताओं से लेकर चुनाव के लिए प्रभारी बनाए गए कांग्रेसियों तक को निशाने पर ले रहे हैं। इस करारी हार के लिए एक दूसरे पर जमकर कीचड़ भी उछाली जा रही है।
कांग्रेसी कहने में संकोच नहीं कर रहे कि ऐसा कब तक चलेगा। लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में तो टिकटों पर बड़े नेताओं का कब्जा हो जाता है। कम से कम जिला पंचायत एवं पार्षद व सभासदों के चुनाव पर से तो कार्यकर्ता का हक खत्म नहीें करना चाहिए। कार्यकर्ता ही वो कड़ी होता है जो बड़े चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी को जिताने में एड़ी चोटी तक का जोर लगाता है। कांग्रेसी कह रहे हैं कि जिस तरह से एक वार्ड में कांग्रेस के कार्यकर्ता का टिकट काटकर पार्टी में नए आए व्यक्ति को दिया गया, वह भविष्य के लिए सही नहीं है। इससे कार्यकर्ता का मनोबल कमजोर पड़ता है।
चुनाव परिणाम ने रही सही कसर भी पूरी कर दी है। तमाम जुगाड़ और रस्साकशी के बाद भी पार्टी के सभी समर्थित प्रत्याशी हार चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल कांग्रेस के नेताओं और संगठन के सामने कार्यकर्ता खड़ा कर रहे हैं कि जब चुनाव लड़वाने में किसी की गर्दन पर तलवार चलाई जा सकती है तो फिर हार के लिए आखिरकार जि़म्मेदार कौन है? कौन इसके लिए आगे आकर जि़म्मेदारी लेगा? अपने किसी चहेते को आगे लाकर चुनाव को फोटो सैशन में बदलने का दौर आखिर कांग्रेसी कब खत्म करेंगे?