आम तौर पर किसी भी चुनाव से पहले आदर्श आचार संहिता की बात होती ही है। पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग मीडिया के लिए भी दिशा निर्देश जारी करता है। मीडिया से जुड़े नियम कायदों की जानकार जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा हर चुनाव में दी ही जाती है। पेड न्यूज या फेक न्यूज जैसी चीजों पर निगरानी करने के लिए जिला स्तर पर समिति भी बनाई जाती हैं। यह सब चुनाव को लेकर सामान्य बात मानी जाती है। क्योंकि अमूमन चुनाव संबंधी अधिकतर नियमों की जानकारी मीडिया को होती ही है। मगर फिर भी चुनाव कार्यक्रम होने के बाद निर्वाचन अधिकारी प्रेस वार्ता के जरिए इन सब बातों की जानकारी सार्वजनिक करते ही हैं। मगर इस बार गाजियाबाद में जो कुछ हुआ उसको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। यहां गाजियाबाद के जिलाधिकारी चुनाव आयोग के निर्देशों की जानकारी देते हुए मीडिया को धमकी देने की बात कहने लगे। हो सकता है कि उनकी भावना चेतावनी देने की रही हो मगर शब्द तो धमकी ही इस्तेमाल किया गया। जिलाधिकारी के धमकी देने की बात ने तूल पकड़ लिया। कानपुर प्रेस क्लब ने तो इस बारे में शिकायत तक कर डाली। हालांकि उस प्रेस वार्ता में मौजूद मीडिया कर्मियों को धमकी जैसे शब्द पर तत्काल आपत्ति दर्ज करा देनी चाहिए थी। मगर शायद तब वहां का माहौल ऐसा ना रहा हो। मगर आपत्ति और नाराजगी सार्वजनिक होने के बाद तो गाजियबाद के जिलाधिकारी को भूल सुधार कर लेना चाहिए था। आखिर लोकतंत्र में मीडिया है तो चौथा स्तंभ ही। मीडिया की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी होती है। चुनाव में मीडिया की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। आजकलतो वैसे भी सोशल मीडिया का जमाना है। लोगों के हाथ में मोबाइल फोन ऐसी ताकत है जिससे सेकेंड भर में एक बात को पूरी दुनिया तक पहुंचाना बेहद आसान है। चुनाव में व्यवस्था बिगडऩे की आशंका सोशल मीडिया से ही होती है। शायद गाजियाबाद के जिलाधिकारी सोशल मीडिया को चेतावनी देना चाह रहे थे मगर धमकी मीडिया को दे गए। चेतावनी और धमकी के बीच के फर्क को समझना चाहिए।