– सुरेश चौधरी –
नोएडा। डीपी यादव नोएडा के सर्फाबाद गांव के मूल निवासी हैं। इस दौरान डीपी यादव ने तमाम मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव लडेंगे। अभी सीट तय नहीं की है। जल्दी ही उनकी पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल की लखनऊ में बैठक होगी। जिसमें सारे समर्थक और पार्टी के पदाधिकारी एकत्र होंगे। उक्त बैठक में चुनाव लडने का फैसला किया जाएगा। डीपी यादव ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर खुलकर बातचीत की। एक सवाल के जवाब में कहा उन्होंने कहा कि अभी सीट का फैसला नहीं किया है। 10-12 सीट हैं, जहां से चुनाव लड सकता हूं। बैनर राष्ट्रीय परिवर्तन दल भी हो सकता है। किसी बडे राजनीतिक दल के साथ गठबंधन भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि राजनीति का वर्तमान परिवेश बदल गया है, लेकिन हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि पार्टियों में बंटकर राजनीति का दम न टूट जाए।
बातचीत के दौरान डीपी यादव ने जेल में रहे वक्त को तीर्थयात्रा कहा। जब उनसे पूछा गया कि इस तीर्थयात्रा के दौरान 6 वर्षों में उन्होंने जेल में रहकर क्या किया, उनकी दिनचर्या कैसी थी, इस पर डीपी यादव ने कहा कि जेल में बिताए 6 वर्षों के दौरान मैंने बड़ी संख्या में कविताएं लिखी हैं। पांच किताबें लिखी हैं। यह जल्द ही प्रकाशित होने वाली हैं। हालांकि, जेल जाने से पहले भी चार किताबें लिख चुका था। जिनमें से कई किताबों का विमोचन पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने किया था। लिखना-पडऩा मेरी पुरानी आदत है। जेल में खाली वक्त इसी लिखाई-पढ़ाई के सहारे गुजरा है। शीघ्र ही मेरी पांच किताबें प्रकाशित होने वाली हैं, उनमें से एक का शीर्षक अभी अंत नहीं है। यह किताब जेल में जाकर सबसे पहले लिखी थी।
राजनीति में अपनी छवि पर टिप्पणी करते हुए डीपी यादव ने कहा कि मैंने ऐसा कभी कोई काम नहीं किया, जिससे किसी की आत्मा को दुख पहुंचे, लेकिन मैं आज तक यह भी नहीं समझ पाया कि मैं कहां का डॉन था। बिना वजह मेरा नाम बदनाम होता रहा। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में न जाने कैसी-कैसी खबरें छपती रहीं। मैंने उनका कभी विरोध नहीं किया। दरअसल, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर कहा करते थे कि एक गलत सवाल का जवाब दोंगे तो हजार गलत सवाल खड़े हो जाएंगे। मैं इसी बात को धारण करके जिंदगी में आगे बढ़ता रहा, लेकिन यह मालूम नहीं था कि इस सब की बिना वजह इतनी बड़ी सजा भुगतनी पड़ेगी। डीपी यादव ने कहा कि जब कोई नेता सत्ता और ताकत में होता है तो वह तमाम अच्छे काम कर सकता है, लेकिन मैंने बिना सत्ता और ताकत में रहे तमाम अच्छे काम किए हैं। आज भी हम 10 हजार बच्चों को पड़ा रहे हैं। 14 स्कूल, कॉलेज और दूसरी शिक्षण संस्थाएं हैं। जिनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी हैं। कोरोनावायरस के दौरान मैंने 60 बच्चों की फीस अपनी जेब से भरी है। हमारी इंडस्ट्रियल यूनिटों में 10 हजार से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं। इनमें बुलंदशहर, गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, बदायूं, और पश्चिम उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से ताल्लुक रखने वाले लोग हैं। लेकिन मैंने इसे लेकर कभी प्रोपेगेंडा नहीं किया, क्योंकि मैं इसे अपना फर्ज मान कर चलता रहा।
डीपी यादव ने बातचीत के दौरान अपने जीवन के एक और पहलू को उजागर किया। उन्होंने बताया कि जब मैं गांव में था तो उपकार फिल्म रिलीज हुई थी। मनोज कुमार और दूसरे किसान चरित्रों को देखकर मेरे मन में भी फिल्म में एक्टिंग करने की बात घर कर गई। दरअसल, युवावस्था में प्रत्येक युवा खुद को किसी अभिनेता सरीखा मानने लगता है। मैं भी मुंबई चला गया और कई धारावाहिकों में ऐक्टिंग की। हालांकि, बडे पर्दे पर नहीं आया था। टीवी पर जरूर दिखने लगा था। जल्दी ही हकीकत से रूबरू हो गया और मुंबई से वापस लौट आया था। दरअसल, परिवार गरीब था। पिताजी फ्रीडम फाइटर थे और फिल्मों तक पहुंचने की हैसियत नहीं थी। पीछे मुडकर देखते थे तो जमीन नजर आती थी।
डीपी यादव ने अपने पुराने दिनों को याद किया और बोले, आजकल तो तमाम तरह के हाईटेक खेल आ गए हैं। दिनभर आदमी मोबाइल पर लगा रहता है। मैं तो अभी भी मोबाइल का इस्तेमाल केवल फोन सुनने या करने तक ही कर पाता हूं। जब जवान था, तब वॉलीबॉल और कबड्डी खेलने का खूब शौक था। जेल में रहते हुए भी अक्सर वॉलीबॉल खेल लेता था। डीपी यादव ने कहा कि आज जहां हाईटेक शहर नोएडा है, वहां के हालात कभी बहुत बुरे थे। यह इलाका दिल्ली और लाल किले से नजदीक था। लाल किले से कोई आवाज दे तो यहां पहुंच जाती थी, लेकिन आजादी के 60 साल बाद तक यहां बिजली नहीं पहुंच पाई थी। इस इलाके में बिजली की पहली लाइन मैं 18 किलोमीटर दूर गाजियाबाद से अपने गांव लेकर आया था।
उन्होंने कहा कि स्कूल और कॉलेज की बात छोड दीजिए, सडकें अंधेरी थीं और रास्ते भी नहीं थे। अंदाजा इस बात से लगाइए कि मैं अपने गांव का पहला ग्रेजुएट लडका था। मेरी दोनों बहनें तो अशिक्षित हैं। इन हालात को बदलने के लिए मैंने प्रयास शुरू किए थे। मैंने अपने मन और विचार से अच्छे काम किए थे, लेकिन लोगों ने डॉन और बाहुबली बना दिया। एक सवाल का जवाब मैं आज तक नहीं खोज पाया हूं कि आखिर मैं कहां का डॉन था। डीपी यादव ने नोएडा अथॉरिटी से स्थानीय किसानों को हक दिलाने के लिए लंबी लडाई लड़ी थी। उन दिनों को याद करते हुए डीपी यादव ने कहा कि मैंने निठारी, हरौला, अट्टा और नोएडा में तमाम मार्केट और जमीन बचाई हैं। आज तक किसी किसान से कुछ नहीं मांगा। आज तक अपने स्कूल के लिए भी नोएडा के किसी अफसर से जमीन नहीं मांगी है। नोएडा के किसानों की जमीन पर यह शहर खडा हुआ है। उनकी समस्याओं को सर्वोपरि रखना चाहिए। फिलहाल नोएडा के किसान अपने हकों के लिए लड़ रहे हैं। मैंने पहले ही दिन उन्हें समर्थन दिया है। यहां के किसानों के लिए मुझे जो भी संघर्ष करना पड़ेगा, वह मैं करूंगा।