युग करवट संवाददाता
गाजियाबाद। नगर निगम में कांग्रेस हमेशा से ही मुख्य विपक्ष की भूमिका में रही है। कांग्रेस के पार्षद जीतकर नगर निगम में पार्टी की आवाज उठाते आए हैं। हां, इस बार हुए विधानसभा चुनाव में चार पार्षद पार्टी छोड़ चुके हैं। ऐसे में मुख्य विपक्षी दल के रूप में खुद को स्थापित करना और उन वार्डों में चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए चुनौती होगा, जहां के पार्षद पार्टी छोडक़र दूसरे राजनीतिक दलों में जा चुके हैं।
दरअसल, नगर निगम चुनाव होने में कम ही समय बचा है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल निगम चुनावों की तैयारियों के लिए कमर कसते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों में किसी पार्टी ने नगर निगम में अपनी ताकत बढ़ाई है, तो किसी की कम हुई है। विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी गठबंधन के पक्ष में बहती हवा ने कांगे्रस को भी नुकसान पहुंचाया। विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के चार पार्षद पार्टी छोडक़र समाजवादी पार्टी में चले गए और पार्टी के पार्षदों की संख्या घटकर 11 रह गई। यदि भविष्य में होने वाले नगर निगम चुनाव की बात की जाए तो जिन वार्डों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की, उनमें माना जा सकता है कि कांग्रेस का जनाधार मजबूत रहा। यूं भी कहा जा सकता है कि पार्टी द्वारा उतारे गए मजबूत कैंडिडेट के दम पर ही वहां जीत दर्ज की। अब जो पार्षद पार्टी छोडक़र दूसरे राजनीतिक दलों में जा चुके हैं वे उसी दल के टिकट पर चुनाव मैदान में होंगे जिनका दामन उन्होंने थामा है। यूं भी कहा जा सकता है कि पार्टी छोडऩे वाले पार्षद नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौती पेश करेंगे। कांग्रेस के सामने भी बड़ा सवाल होगा कि पिछले नगर निगम चुनाव में अपने जिताऊ रहे वार्डों में किसको प्रत्याशी बनाए, जो मजबूती के साथ चुनाव लड़ सकें। सबसे कठिन चुनौती पसौंडा के दो वार्ड, लोहिया नगर और नंदग्राम से कांग्रेस को मिलने वाली है।
इन क्षेत्रों के पार्षदों ने विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का हाथ छोड़ा था। देखना दिलचस्प होगा कि जिन वार्डों में पिछली बार कांग्रेस के पार्षद जीतकर पार्टी छोडक़र चले गए, वहां पार्टी किसे प्रत्याशी बनाती है। इन चार वार्डों पर पार्टी कार्यकर्ताओं की भी विशेष नजर रहेगी। साथ ही कांग्रेस के लिए भी इन वार्डों में जीत दर्ज करना इस बार चुनौती साबित होगी।