लोकसभा चुनाव अपने चरम की ओर चल रहा है। चुनावी रण के खिलाड़ी मैदान में दम ठोकने लगे हैं। भाजपा का कमल खिलाने के लिए गाजियाबाद के मंझे हुए खिलाड़ी अतुल गर्ग हैं, कांग्रेस का हाथ मजबूत करने को डोली शर्मा हैं, हाथी की सवारी नंदकिशोर पुंड़ीर कर रहे हैं। इसके अलावा सुभाषवादी भारतीय समाजवादी पार्टी से धीरेन्द्र भदौरिया भी हैं। इन तमाम प्रत्याशियों से सवाल यह है कि क्या ये लोग राज्य और केन्द्र स्तरीय मामलों के साथ स्थानीय मुद्दों पर कुछ बोलेंगे या उससे दूरी बनाकर रखेंगे। सबसे बड़ा मामला अभिभावकों का है। गाजियाबाद में अधिकतर प्राइवेट स्कूल आरटीई के तहत एडमिशन देने से कतराते हैं। अधिकारिक रिकार्ड भी बताता है कि आरटीई की तकरीबन 60 फीसदी सीटें खाली ही रह जाती हैं। शिक्षा विभाग और प्रशासन केवल नोटिस जारी कर अपने दायित्व पूरा कर लेता है। अभिभावक परेशान घूमते रहते हैं। स्कूलों की मनमानी यहीं नहीं रुकती कहीं फीस का मामला है, कहीं युनिफार्म का कहीं जबरन किताबें देने का। स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए आज के प्रत्याशी कल सांसद बनकर क्या कार्रवाई करेंगे? मंडोला में पीडि़त किसान वर्षों से आंदोलन कर रहे हैं, कई बार पुलिस की लाठी खा चुके हैं, इस पर उनके क्या विचार हैं? नगर निगम की दुकानों के बढ़े किराए का मामला, इंद्रापुरम कालोनी के नगर निगम को हैंडओवर का मामला, ट्रांसहिंडन में सरकारी अस्पताल और कालेज का मामला, शहर में पेयजल की समस्या आदि अनेक मामले हैं जिन पर प्रत्याशियों को घोषणा पत्र जारी करना चाहिए। गाजियाबाद का नाम बदलने पर प्रत्याशी अपनी राय दें, शहर को सिटी बस सेवा की जरूरत है, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है, अच्छी कनेक्टिविटी की जरूरत है, बेहतर यातायात की जरूरत है, बड़े औद्योगिक संस्थान खोले जाने की जरूरत है। अब देखते हैं जनमानस से जुड़े इन मुद्दों पर कौन सा प्रत्याशी कब बोलेगा?