दो दशकों में बदल गई तस्वीर
दो दशकों से हर क्षेत्र में जहां आधुनिकता के बल पर परिवर्तन हुआ है, तरक्की हुई है तो वहीं गिरावट भी आयी है। चाहे राजनीति का क्षेत्र हो या फिर मीडिया का क्षेत्र हो इसमें भी पहले जैसी हनक कम हुई है। उसके कारण ये है कि अब चुनाव में या फिर अन्य कार्यों के लिए मीडिया का भी एक पैकेज होता है। पहले ऐसा कुछ नहीं होता था। स्वास्थ्य सेवा को लेकर भी अब अस्पतालों के अपने पैकेज बन गये हैं। बड़े से बड़े अस्पताल में आप जाइये वहां पर फाइव स्टार होटल की तरह आपको सेवा मिलेगी लेकिन उससे पहले आपके सामने एक पैकेज आयेगा जिसमें बताया जायेगा कि ये वाला स्टन डलेगा तो ये पैकेज होगा ये डलवायेंगे तो ये पैकेज होगा और तत्काल पैसा जमा कराया जाता है। ऐसा पहले कभी नहीं होता था। राजनीति क्षेत्र में भी पहले काम के बल पर जनता में कितनी पकड़ है इसके बल पर और पार्टी में कब से सेवा कर रहे हैं इसके नाम पर टिकट मिलता था। आज ऐसा नहीं है। चाहे पार्टी में एक दिन पहले आये हो, जनता जानती ना हो, बस जेब गरम होना चाहिए और टिकट ले आओ। ये अधिकतर सभी पार्टियों ने इस तरह से टिकट का पैकेज बना रखा है। क्षेत्रीय दलों के अलावा अब राष्टï्रीय दल भी पैकेज के आधार पर टिकट देते हैं, ना उसकी काबिलियत देखते हैं और ना ही उसका पुराना इतिहास। यही कारण है कि लोकसभा और विधानसभा में दो दशकों से जो तस्वीर बदली वो सबके सामने है। कहीं भी कोई भी समर्पण किसी नेता में दिखाई नहीं देता। पैकेज की बात की जाए तो चुनावों में अब मीडिया भी पैकेज की बात करता है। मीडिया जगत के बड़े घरानों में दो दशक पहले ये पैकेज सिस्टम शुरू किया था और अब आहिस्ता-आहिस्ता बड़ों से लेकर छोटे मीडिया घराने भी चुनावी पैकेज की बात करते हैं और इस पैकेज में बकायदा, हर तरह का वायदा पार्टी से और प्रत्याशी से करते हैं। जाहिर है जब मुंह खायेगा तो आंख शर्माएगी और जो सामने दिखाई देगा वो पैकेज के चक्कर में ना लिख पायेगा ना दिखा पायेगा। हालांकि २०१४ के बाद मीडिया खासकर जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जो हालत है वो सबके सामने है। आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में करने वाले देश के नामचीन पत्रकार यू टयूब के सहारे अपनी बात रख रहे हैं। क्योंकि मीडिया जगत के बड़े घरानों में उनकी कलम पर पाबंदी लगाने की कोशिश की, कुछ ने समझौता कर लिया और कुछ घर बैठ गये। प्रिंट मीडिया जरूर इन सबसे दूर था लेकिन इसमें भी जो बड़े अखबार हैं वो भी कहीं ना कहीं समझौता करते दिखाई देते हैं। चुनावी मौसम में पैकेज के चलते वो सब नहीं लिख पाते क्योंकि एक तरह से कलम पर भी पैकेज की छाप होती है। इसीलिए जनता भी जो दिखता है वही बिकता है पर ही भरोसा करती है और जिसके पास ज्यादा चकाचौंध और सजावट होती है उसी में वो खो जाती है और ऐसे निर्णय ले लेती है जिसको बाद में पछताना पड़ता है। बहरहाल, ये चुनावी पैकेज भी चुनाव में चुनावी माहौल को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाते हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता। आज चुनाव इतना महंगा हो गया है कि हर किसी के लडऩे की हिम्मत नहीं है। क्योंकि सभी को कुछ ना कुछ चाहिए होता है। कई दशक पहले झंडो और बिल्लों के सहारे चुनाव लड़ा जाता था और जीता जाता था। आज दूसरे तरीके से चुनाव लड़े जाते हैं। इसी वजह से राजनीति में ऐसे लोग आ रहे हैं जिनको जनता जानती भी नहीं है लेकिन पैकेज के चक्कर में या अन्य लाभ के कारण जय-जयकार होती है। हालांकि अब भी ऐसे लोग हैं जिनकी वजह से राजनीति की छवि अब भी साफ है। कई धन कुबेर देश में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं लेकिन उनकी जमानत तक नहीं बची। मीडिया में आज भी कलम के कुछ सच्चे सिपाही है जिनकी वजह से लोकतंत्र भी बचा हुआ और भरोसा भी। फिर कहीं ना कहीं जो पैकेज सिस्टम हुआ है उससे सही तस्वीरें जरूर धूमिल दिखाई देती है। देखते हैं ये सिस्टम अब कब तक चलता है। जय हिंद