उत्तर प्रदेश चुनाव में 150 का आंकड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ कहा जा रहा है कि भाजपा अपने 150 विधायकों का टिकट काट सकती है और दूसरी ओर ओमप्रकाश राजभर दावा कर रहे हैं कि भाजपा के 150 विधायक सपा में शामिल होने जा रहे हैं, जिनमें एक दर्जन से ज्यादा मंत्री भी हैं। राजभर ने तो यह भी दावा किया है, एक चैनल के प्रोग्राम में बैठकर कि उत्तर प्रदेश भाजपा के एक उपाध्यक्ष उनके पास सपा से टिकट दिलाने की सिफारिश के लिए आए हैं।
भाजपा के करीब चार महीने पहले ही 150 विधायकों के टिकट काटने का मन बना लिया था। उस समय खबर यह आई थी कि एक तो साढ़े चार साल में अनर्गल बयानबाजी करने वाले विधायकों का पत्ता साफ होगा और दूसरे उन विधायकों को भी टिकट नहीं दिया जाएगा जो संगठन और सरकार की गतिविधियों में पूरी तरह से निष्क्रिय रहे। इसके अलावा जिन विधायकों ने 70 साल की उम्र पार कर ली है उन्हें भी चुनाव लडऩे का मौका नहीं दिया जाएगा। उड़ती चिडिय़ा खबर लाई है कि जिन विधायकों को ‘आराम’ करने को कहा जाएगा, उनमें मंत्री से लेकर हारे-जीते उम्मीदवार भी शामिल हैं।
अगर डेढ़ सौ के आंकड़े पर ध्यान दें तो यह कहता है कि 2017 में विधायक-मंत्री बने भाजपा नेताओं में करीब-करीब आधे किसी काम के नहीं है, ऐसा टिकट काटने के लिए तय भाजपा का अपना ही क्राइटेरिया कह रहा है।
यह तो निश्चित है कि जब भाजपा ने चुनाव में 350 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, तो खेत में खड़ी खरपतवार को बेदर्दी से काटना ही होगा। खरपतवार हटाने से खाली हुए खेत के बीच में नई पौध लगाकर उत्तम उपज लेने का उपाय भी भाजपा करेगी ही, इस दिशा में काम शुरू भी हो चुका है।
चुनावों के दौरान अनेक अधिकारियों का सर्विस को बीच में ही छोडक़र, मतलब स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति के माध्यम से समाज-सेवा, राष्ट्र-सेवा करने को मन मचल जाता है और ऐसे ‘देशभक्त अधिकारी’ सत्ताधारी पार्टी से ही टिकट पाना चाहते हैं और पा ही लेते हैं। दरअसल ये अधिकारी अपने आका के निर्देश पर ही सेवा समाप्ति की घोषणा करते हैं और राजनीति की नई पारी खेलने मैदान में उतरते हैं। वास्तव में ये वो अधिकारी होते हैं, जो सेवा में रहकर सरकार के लिए राजनीति करते हैं। सत्ता इनको राजनीति में उतार कर अपने हिसाब से इस्तेमाल करती है।
मुझे नाम याद नहीं आ रहा, लेकिन भाजपा के ही एक नेता ने कहा था- ‘भाजपा में अनुभवी नेताओं का अभाव है और इस कमी को पूर्व नौकरशाहों के माध्यम से पूरा करने का काम किया जाता है।’ ताजा मामला है, कानपुर के पुलिस कमिश्नर रहे असीम अरुण का, जिनकी सर्विस अभी 8 साल शेष थी, लेकिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर मुख्यमंत्री योगी के आशीर्वाद से कन्नौज से टिकट पा लिया है। असीम अरुण को चुनाव आते ही अचानक लगा कि वो जितनी समाज सेवा की करना चाहते हैं, उतनी तो केवल विधायक बनकर ही की जा सकती है।
इसी तरह प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक राजेश्वर सिंह का वीआरएस आवेदन भी स्वीकार हो गया है। राजेश्वर सिंह के धौलाना या साहिबाबाद से भाजपा के टिकट पर चुनाव लडऩे की खबर आ रही है। सिंह साहब भी योगी जी की गुड बुक की लिस्ट से ही बताए जाते हैं। सवाल यह है कि जो कई साल से धौलाना से टिकट पाने की चाह में, चाहे-अनचाहे समाज-सेवा, पार्टी-सेवा कर-कर के थक गए हैं, उनको क्या मुआवजा मिलेगा? इसी तरह अगर सिंह साहब साहिबाबाद से टिकट पा गए, तो भारी-भरकम सिटिंग एमएलए का क्या होगा? एक सवाल और अगर सुनील शर्मा का टिकट कटा, तो क्या जिले की एक भी सीट पर ब्राह्मïण उम्मीदवार नहीं उतारा जाएगा? ऐसा हुआ तो ब्राह्मïण नाराज नहीं हो जाएगा क्या?