प्रमुख संवाददाता
गाजियाबाद। सदर विधानसभा सीट को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता मयंक गोयल और पवन गोयल बराबर अपने प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, दोनों नेताओं ने अधिकारिक तौर पर इस बात की कोई घोषणा नहीं की है कि वो सदर सीट से चुनाव लडऩे के इच्छुक हैं, लेकिन अगर आप उनकी वर्किंग पर नजर डालेंगे तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चाहे मयंक गोयल हों या पवन गोयल हों उनकी दावेदारी शहर सीट से ही है।
बीच-बीच में इस तरह की भी बातें सामने आती हैं कि मयंक गोयल मुरादनगर विधानसभा सीट से भी दावेदारी कर सकते हैं, लेकिन इस तरह की चर्चाओं में कोई भी दम इसलिए नहीं है कि उनके जितने भी होर्डिंग्स लगे हैं, अगर उनपर गौर करें तो शहर में विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले सभी भाजपा नेताओं के ही फोटो लगे हैं। चाहे पार्षद हों, मंडल अध्यक्ष हों या कोई भी पदाधिकारी हों सभी शहर विधानसभा में ही आते हैं। इसलिए मयंक गोयल का साफ संकेत शहर सीट को लेकर ही है। वैसे भी मयंक गोयल स्वयं या उनका परिवार हो, उनकी बहुत मजबूत पकड़ पुराने शहर में है। इतना ही नहीं सदर विधानसभा का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र क्रॉसिंग में भी मयंक गोयल की बहुत मजबूत पकड़ है।
वहीं अगर पवन गोयल की बात करें तो वो भी अंदरखाने शहर सीट से ही जोर आजमाइश कर रहे हैं। उनका ध्यान भी शहर सीट पर ही है। उनका कोई बयान हो या कोई समस्या की बात हो तो वो शहर सीट पर ही होता है। कल जीडीए की बोर्ड बैठक में भी बतौर जीडीए बोर्ड सदस्य पवन गोयल ने क्रॉसिंग और विजयनगर की समस्याओं को उठाकर उन चर्चाओं को और बल दे दिया कि उनकी नजर भी सदर सीट पर ही है।
इस सीट से मौजूदा विधायक एवं योगी सरकार में राज्यमंत्री अतुल गर्ग भी इस बात का ऐलान कई बार कर चुके हैं कि वो सदर सीट से ही दोबारा चुनाव लड़ेंगे। मुरादनगर सीट से चुनाव लडऩे का कोई विचार नहीं है। बहरहाल, अब देखना है कि इस सीट पर किसकी लॉट्री खुलती है। वैसे मयंक गोयल का कॉन्फिडेंस काफी मजबूत है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की माताश्री की शोकसभा में उन्होंने एक एमएलसी से ये दावा किया कि आज का समय और तारीख नोट कर लें टिकट उन्हीं को मिलने जा रहा है। अब इतना कॉन्फिडेंस है तो कहीं ना कहीं उनके पास कोई मजबूत आका जरूर होगा।
भाजपा युवा नेता अश्विनी शर्मा ने भी इस बात की पुष्टिï की कि मयंक गोयल के पास एक मजबूत कड़ी है और अगर उन्होंने मन से सिफारिश कर दी तो फिर मयंक का कॉन्फिडेंस हकीकत में बदल सकता है। अश्विनी शर्मा ने उनका नाम नहीं बताया। बहरहाल, चुनाव के दौरान आकाओं का आशीर्वाद काफी हद तक काम करता है। बदलती राजनीतिक तस्वीर में अब जीवनभर कोई कितनी सेवा करता रहे, सर्दी-गर्मी, बरसात में पार्टी का झंडा उठाए भले ही कोई घूमता रहे लेकिन रातोंरात कोई नया नेता आता है और उसको पार्टी उम्मीदवार बना देती है। कोई दूसरे दल से आता है तो अपने दल वाले का समर्पण ताक पर रख लिया जाता है और दूसरे दल वाले को पूरा सम्मान दिया जाता है। अब जिस तरह की चर्चाएं चल रही हैं कि प्रदेश में जो एमएलसी के चुनाव होने जा रहे हैं या मंत्रिमंडल का संभावित विस्तार है, उसमें भी दूसरे दल से आने वाले को मौका दिया जा रहा है और जो लोग जमाने से भाजपा का झंडा उठाए घूम रहे हैं, उन्हें फिर निराशा ही हाथ लगेगी।