सुब्रत भट्टाचार्य
गाजियाबाद। मौका था लेखक ख्वाजा इफ्तिखार अहमद की किताब का विमोचन का। विमोचन करने वाले थे राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ. मोहन भागवत। लिहाजा संघ की विचार धारा और मुसलमानों के प्रति संघ की सोच पर चर्चा होनी ही थी। चर्चा हुई और बड़ी गहराई से हुई। सरसंघचालक से पहले लेखक ख्वाजा इफ्तिखार अहमद ने संघ और मुसलमान को लेकर ऐसी तकरीर पेश की कि सुनने वाले अवाक रह गए। उन्होंने खिलाफत आंदोलन से लेकर अबतक मुसलमानों की भूमिका और आखिर मुस्लिम संघ और भाजपा को पसंद क्यों नहीं करते हैं, इस पर अपने अनुभवों के साथ हर एक घटना का विस्तार से चर्चा की। दरअसल, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के निजी सलाहकार रहे ख्वाजा इफ्तिखार अहमद ने अंग्रेजी में एक किताब ‘द मीटिंग ऑफ माइंड्स- ए ब्रीजिंग इनिशियएटिवÓ लिखी है। इस किताब का हिन्दी और उर्दू में भी रूपांतरण किया गया है। रविवार को वसुंधरा स्थित मेवाड़ इंस्टीट्यूट में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने इस किताब का विमोचन किया। इस किताब में 1920 से अबतक के राजनीतिक घटनाक्रमों के साथ देश की तरक्की में मुसलमानों की भूमिका पर विस्तार से बताया गया।पहली बार आरएसएस के किसी बड़े पदाधिकारी ने किसी मुस्लिम लेखक की किताब का विमोचन किया है। डॉ. मोहन भागवत ने अपने उदबोधन की शुरुआत में ही स्पष्टï कर दिया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य संघ की छवि को बदलना नहीं है। संघ को अपनी छवि की चिंता कभी नहीं रही है। संघ अपना काम अनवरत जारी रखा हुआ है। ना ही यह कार्यक्रम मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए है। संघ कभी चुनावी पक्षधर नहीं रहा , संघ सिर्फ राष्टï्र के पक्ष में है। यह राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। मनुष्यों को जोडऩे का काम राजनीति नहीं कर सकती है।

मोहन भागवत ने कहा कि यह किताब एकता का आहवान करती है। और दिल से करती है। संदेश यह है कि राष्टï्र की भलाई और राष्टï्र को मजबूत करने के लिए दोनों समाज को संगठित होना पड़ेगा। हिन्दू और मुस्लिम दोनों अलग-अलग नहीं है। दोनों जब मानते हैं कि अलग-अलग है तो दोनों के लिए ही मुश्किलें खड़ी हो जाती है। इस एकता का आधार मातृभूमि है। मातृभूमि के प्रति दोनों अपने कर्तव्यों से बंधे हैं। इस देश में दशकों से मलयज शीतलाम की परपंरा रही है। मातृभूमि इतना देती है कि हम बिना झगड़ा किए रह सकते हैं। सरसंघचालक ने कहा कि हम कल्पना तक नहीं कर सकते हैं कि हम अलग-अलग है। मातृभूमि के बाद हमारी एकता का आधार हमारी परंपरा है। 40 हजार साल पहले हम सभी का डीएनए एक समान था। हम एक थे, एक है और एक ही रहेंगे, क्योंकि इस एकता का आधार हमारी सभ्यता, संस्कृति और एक जैसा रहन-सहन है। डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि यह कहना कि हिन्दुओं की यह स्थिति मुसलमानों के लिए है, यह सही नहीं है। जहां ज्यादती होती है, वहां बहुसंख्यक हिन्दू ही विरोध पर आ जाते हैं। मुद्दों पर मत अलग-अलग हो सकते हैं मगर पूर्वज सभी के एक है। उन्होंने कहा कि जख्म जरूर हुए हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन जख्मों को भरा भी जा सकता है। जख्मों को भरने का काम दोनों समुदाय को करना है। दोनों पक्षों को अपनी बात डटकर रखनी होगी। हिन्दू समाज के शक्तिशाली बनने से मुस्लिम समाज कमजोर नहीं होगा। मुस्लिमों को इस देश में किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। जहां डर होता है, वहां डायलॉग नहीं हो सकता है। डायलॉग शुरू हुआ है, अब इसे आगे बढ़ाना होगा। मगर मंजिल अभी बहुत दूर है। मंजिल की ओर चलना पड़ेगा। चलेंगे तो खुराफाती खुराफात करेंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म की पूजा पद्घति उस धर्म का निजी मामला होता है। किसी की श्रद्घा को रोक नहीं सकते हैं। कोई निराकार को मानता है तो कोई आकार को। भारत की पंथ निरपेक्षता सभी धर्मों को अपनी आजादी देती है। उन्होंने कहा कि हालांकि कुछ लोग अभी भी है जो धर्म के नाम पर दोनों को लड़ाकर अपना फायदा देखते हैं। डर बैठाया जाता है। इस डर को हटाना है, छिपाना नहीं है। डर से एकता नहीं होती है। बिना डरे दोनों कौमों को भारत के विकास और उसे मजबूत बनाने के लिए एकजुट होकर काम करना होगा।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि लिंचिंग करने वाले आतताई है। इनकों कानून के जरिए सख्त सजा मिलनी चाहिए। अब कदम आगे बढ़ा दिए गए। ये कदम अब पीछे नहीं हटेंगे। सभी को मिलकर देश को आगे बढ़ाना है।