समझ ही नहीं आ रहा है कि गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर आखिर जनता को समझाना क्या चाहते हैं, क्या संदेश देना चाहते हैं। अपराध कम हो रहा है या बढ़ रहा है इस पर बात ही नहीं करते। हाल के दिनों में जो कुछ हुआ है उस पर थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है। एक सब इंस्पेक्टर ने कविनगर थाने में शिकायत दी कि कचहरी के आस पास एक आरोपी ने उनके ऊपर हमला किया। हैरान कर देने वाली बात यह है कि सब इंस्पेक्टर की शिकायत पर थाना पुलिस ने कोई एक्शन ही नहीं लिया। एक्शन तो छोडि़ए रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की। उससे भी हैरानी तब हुई जब सब इंस्पेक्टर ने एसीपी, डीसीपी और पुलिस कमिश्नर तक अपनी बात पहुंचाई, मगर तब भी सब इंस्पेक्टर की सुनवाई नहीं हुई। हार कर उनको कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने मजबूरी में केस दर्ज किया। अब आप समझिए कि जब ऑन डयूटी सब इंस्पेक्टर की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती तो भला आम आदमी की थानों में क्या हालत होती होगी। दूसरी घटना भी कम हैरानी वाली नहीं है। गौतमबुद्घनगर से एक इंस्पेक्टर का गाजियाबाद तबादला कर दिया गया। इन पर कई गंभीर धाराओं में नोएडा में केस दर्ज हैं। गाजियाबद में तैनाती पाने के बाद इस आरोपी इंस्पेक्टर को थाने का चार्ज देने में कतई देर नहीं की गई। केस के आरोपी इंस्पेक्टर को थानेदार बनाने की शबर अखबारों की सुर्खी बनी, लेकिन कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा। अब यही समझ नहीं आ रहा है कि गाजियाबाद किस तरह की पुलिसिंग हो रही है। गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर जनता को क्या संदेश देना चाह रहे हैं। क्या बताना चाह रहे हैं। यही कि पुलिस अपनी मनमर्जी चला रही है, चाहेगी तो रिपोर्ट दर्ज होगी अन्यथा नहीं? फिर चाहे शिकायतकर्ता पुलिसकर्मी ही क्यों ना हो। ऐसा करने से उस आरोपी का कितना मनोबल बढ़ा होगा, अब वह किसी पुलिसकर्मी को भला क्या सम्मान देगा। यह भी कि किसी भी जिले में दरोगा या इंस्पेक्टर किसी भी आरोप में क्यों ना घिरा हो गाजियाबाद आ जाए और चार्ज ले ले।