मोदी की तीसरी पारी

केंद्र में तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने शपथ ली। भाजपाईयों ने २०१९ की तरह तो नहीं फिर भी एक दूसरे को मिठाईयां खिलाकर जश्न मनाया। कांगे्रस-सपा व अन्य दलों के गठबंधन को मिली मजबूत जीत के बाद भी वो सब विपक्ष की भूमिका में रहे। कांगे्रस के अध्यक्ष का ये बयान भी बहुत अहम है कि अभी जश्न मनाने का समय नहीं है तो वहीं टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने पूरे दावे के साथ कहा है कि केंद्र में बहुत जल्द इंडिया गठबंधन की सरकार बनेंगी। इतना ही नहीं विपक्ष अब इस बात को लेकर भी मोदी जी की आलोचना कर रहा है कि अबकी बार मोदी सरकार नहीं है बल्कि एनडीए सरकार बोला जाएगा। इन तमाम बातों के पीछे मुझे मिसाल चरितार्थ होती नजर आ रही है जैसे खिसयानी बिल्ली खंभा नौंचे…। अब सरकार मोदी जी की है या एनडीए की, फिलहाल तो इंडिया गठबंधन की नहीं है। तो फिर बेवजह इस तरह की बातें करके क्या संदेश देना चाह रहा है विपक्ष। जो जीता वो सिकंदर इस बात को विपक्ष को याद रखना चाहिए। आज जिसकी सरकार है उनकी पार्टी भी सबसे ज्यादा सीटें लेकर आयी और उनके साथियों की सीटें मिला लें तो सबसे मजबूत गठबंधन उन्हीं का है। हालांकि मंत्रालयों के बंटवारे के बाद जो बड़े सहयोगी दल हैं वो जरूर कहीं ना कहीं अंदरखाने नाराज दिखाई दे रहे हैं। शिवसेना (शिंदे) की तरफ से नाराजगी का अहसास करा दिया गया है। वहीं एनसीपी (अजित) का कोई प्रतिनिधित्व केंद्र में नहीं होने पर वो भी नाराज हैं। हालांकि उनका मात्र एक सांसद ही जीता है, उनकी नाराजगी से कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। तीन माह बाद महाराष्टï्र में चुनाव होना है, अब सबकी नजर उसी पर है। लेकिन ये नाराजगियां विपक्ष के लिए ज्यादा खुश करने वाली नहीं है। इसलिए खिसयानी बिल्ली की तरह विपक्ष खंभा नौंचना बंद करें और केंद्र में चाहे मोदी सरकार कही जाए या एनडीए की सरकार कही जाए उसको जनहित के मुद्दे पर घेरना चाहिए। हालांकि तीसरी आंख ने देखा कि २०२४ में जिस तरह भाजपा का ग्राफ गिरा है इससे तो भाजपा अपने आप को संभालने भी लग गई है। किसानों की किस्त की फाईल पर साइन और तीन करोड़ मकान बनाने का ऐलान इस बात का सबूत है। भाजपा अपनी खिसकती जमीन को काबू में करना चाहती है इसलिए विपक्ष खंभा नौंचने के बदले जो जमीन उसे मिली उसे मजबूती के साथ कायम रखे। जय हिंद