कई दशक पुरानी बात है। मेरा एक अजीज़ दोस्त यूपी पुलिस में क्षेत्राधिकारी था और गाजियाबाद में ही तैनात था। प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार थी उसका बड़ा नेता जब कभी दिल्ली आता तो सुरक्षा के मद्देनजर प्रदेश पुलिस की ओर से उसी मित्र की ड्यूटी लगती। एक दिन उसका दिल्ली स्थित इस बड़े नेता के बंगले से फोन आया कि भाई साहब एक बड़ी उलझन है और कोई जवाब नहीं खोज पा रहा। पूछने पर उसने बताया कि पिछले तीन दिन से मैं देख रहा हूं कि लोगबाग ब्रीफकेस अथवा सूटकेस के साथ आते हैं और जब वापिस जाते हैं तो उनके हाथ ख़ाली होते हैं। इस पर मैंने कहा कि इसमें उलझन क्या है। लोगबाग अपना काम कराने को पैसे लेकर आते होंगे और देकर वापिस चले जाते होंगे। इस पर उसने जो कहा उससे मैं भी उलझन में पड़ गया। उसने कहा कि यह तो मैं भी समझता हूं कि सूटकेस में रूपये ही होंगे और जाहिर है कि कहीं न कहीं इस्तेमाल भी हो जाते होंगे। मेरी उलझन तो यह है कि इन खाली ब्रीफकेसों का क्या होता होगा? इतने सारे ब्रीफकेस भीतर किस काम आते होंगे? आजकल नेताओं के कपड़ों पर देश में खूब बहस हो रही है। कोई कहता है कि फलां नेता इतनी बात दिन में कपड़े बदलता है और फलां इतनी बार। ये सब पढ़ सुन कर मेरे मन में भी उस क्षेत्राधिकारी जैसा सवाल ही कौंधता है कि ये नेता लोग अपने पुराने कपड़ों का क्या करते होंगे? भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी द्वारा पहनी गई बर्बरी कम्पनी की टी शर्ट का मुद्दा उठाकर भाजपा ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल लिया है। इस शर्ट को 45 हजारी बताने पर कांग्रेस भी नरेंद्र मोदी के कथित दस लाख के सूट का तंज दोहरा रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी दिन में ३-३ बार कपड़े बदलते हैं और उनके कपड़ों पर लाखों रूपये प्रतिदिन खर्च होते हैं। अरविंद केजरीवाल कई साल पहले ही यह दावा कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी के कपड़ों का कुल खर्च दिल्ली सरकार के प्रचार खर्च से ज्यादा है। केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि नरेंद्र मोदी दिन में पांच बार कपड़े बदलते हैं और उनके एक जोड़े की कीमत ही दो लाख रूपये होती है।
समझ नहीं आ रहा कि क्या यह सब उसी देश में हो रहा है जहां महात्मा गांधी जैसे लोग पैदा हुए जिन्होंने करोड़ों भारतीय को नंगे बदन देखकर खुद एक लंगोटी में रहने का फैसला कर लिया था? किसी महत्वपूर्ण बैठक से पहले उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल की फटी धोती उनकी बेटी को सिलनी ही पड़ती थी। बिहार के मुख्यमत्री रहे कर्पूरी ठाकुर के लिए नया कुर्ता खरीदने को पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को पार्टी बैठक से पहले चंदा एकत्र करना पड़ता था। साल 2008 में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इसलिए इस्तीफा देना पड़ गया था कि जिस दिन देश पर आतंकी हमला हुआ उस दिन उन्होंने तीन बार कपड़े बदल कर अपनी फजीहत करवा ली थी। बड़े नेता बनने से पहले स्वयं नरेंद्र मोदी अपने कुर्ते की बांह इसलिए काट लिया करते थे कि उसे धोने में उन्हें आसानी होती थी। मगर अब स्थितियां बदल चुकी हैं। प्रधानमंत्री और अन्य बड़े नेता ही नहीं देश का हर छुटभैया नेता भी अब अपने कपड़ों का खास खयाल रखता है। मॉडल की तरह नेता भी अब हर सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए नए कपड़े बनवाते हैं। अब कौन सा नेता अपने कपड़ों पर कितना खर्च करता है यह तो किसी को नहीं पता। प्रधानमंत्री के कपड़ों के बाबत एक आरटीआई से पूछे गए सवाल से भी यह सत्य उजागर हुआ है कि ऐसी जानकारी सार्वजनिक डोमेन पर उपलब्ध नहीं है। शायद यही कारण है कि किसी भी नेता के कपड़ों के बाबत कुछ भी आरोप आसानी से लगाया जा सकता है और उसकी पुष्टि भी नहीं हो सकती। अब आप पूछेंगे कि इससे मुझे क्या परेशानी है। तो जनाब मुझे कोई परशानी नहीं है। मेरा तो बस असमंजस है और वह भी उस क्षेत्राधिकारी जैसा ही कि चलो कपड़े तो ये नेता लोग महंगे महंगे सिलवा सकते हैं मगर अपने पुराने कपड़ों का ये लोग क्या करते हैं?