खादी और खाकी का रिश्ता काफी पुराना है। इन दोनों के सामंजस्य और समन्वय से ही व्यवस्थाएं चलती हैं। यदि खाकी और खादी में मनमुटाव हो जाए तो फिर व्यवस्थाएं भी चरमारा जाती हैं। बदलती राजनीतिक तस्वीर के बाद तो अब अफसर चाहें वो पुलिस के हों या फिर प्रशासन के, डेढ़ दशक से इन अफसरों में कुछ ऐसे हैं जो पार्टी कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगे हैं। यही वजह है कि जब-जब सरकारें बदली हैं काम करने वाले एवं काबिल अफसर बर्फ में लगा दिये जाते हैं, जबकि अधिकारी तो अधिकारी हैं। जनता सिर्फ सरकारें बदलती हैं, लेकिन सरकारें सबसे पहले पुरानी सरकारों में तैनात अफसरों को बदलती हैं। जाहिर है ये बदलाव डेढ़ दशक से चल रही राजनीति में आया है। इसके एक नहीं कई उदाहरण हैं, बसपा की सरकार आती है तो सपा में तैनात अधिकारी हटा दिये जाते हैं और सपा आती है तो बसपा में तैनात अधिकारी हटा दिये जाते हैं। अब भाजपा का भी यही हाल है, इस सरकार में भी कई अफसर ऐसे हैं जो आउट ऑफ वे जाकर काम करते हैं। हालांकि, भाजपा में ऐसे अफसरों की संख्या कम है, लेकिन फिर भी भाजपा भी अब दूसरे दलों की तरह ही काम करने लगी है। तमाम काबिल अफसर आज भी साइड पोस्टिंग पर तैनात हैं। बहरहाल ये सरकार का अपना विवेक है, लेकिन चर्चा है कि इस सरकार में तैनात एक पुलिस के बड़े अफसर जो एडीजी हैं वो भी शायद कानपुर के कमिश्नर रहे असिम अरुण की तरह खाकी उतारकर खादी पहन सकते हैं। लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चाओं पर विश्वास करें तो लोकसभा चुनाव २०२४ में ये एडीजी कहीं से किस्मत आजमा सकते हैं। चाहें बसपा हो या सपा सभी में ऐसा हुआ है कि अफसरों ने रिटायरमेंट के बाद चुनाव लड़ा। भाजपा में भी कई ऐसे आईपीएस नेता बने, लेकिन उन्होंने रिटायरमेंट के बाद पार्टी ज्वॉइन की। असिम अरुण ने तो अपनी सर्विस के कई साल बाकी रहने के बावजूद खाकी उतारकर खादी पहन ली। इसलिए जो चर्चाएं हो रही हैं उसको इसी वजह से बल मिल रहा है कि सर्विस में रहते हुए खाकी उतारकर खादी पहनी जा सकती है तो फिर कुछ भी संभव है। जिन एडीजी की चर्चा है वो सरकार के बेहद निकट माने जाते हैं और काफी समय से अच्छे पद पर तैनात भी हैं। अब ये समय बताएगा कि ये चर्चाएं ही रहेंगी या फिर हकीकत में एडीजी साहब को खादी में देखा जाएगा।
– जय हिन्द।