चुनावी मौसम के बीच
बसपा प्रमुख मायावती अपने कठोर निर्णयों के लिए हमेशा जानी जाती थी। लेकिन अपने भतीजे आकाश आनंद को लेकर जिस तरह से उन्होंने फैसला लिया है इसको लेकर मायावती पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सभी की जुबान पर एक ही बात है कि मायावती ने किसी ना किसी दबाव में आकाश आनंद को सभी पदो से हटाने का निर्णय लिया है। उत्तराधिकारी से भी हटाने के पीछे भी कई राज हो सकते हैं। यदि पदों से ही हटाती तो जो दबाव की बातें हो रही है उन पर मुहर लगती इसलिए उत्तराधिकारी वाला दांव भी जानबूझ कर चला गया था। चुनावी मौसम में एक इतने बड़े स्टार प्रचारक जिसको सुनने के लिए घंटों लोग इंतजार कर रहे थे उसको हटाना चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल कम ही समय में आकाश आनंद ने अपने समाज में और दूसरे समाज में भी बहुत अच्छी पकड़ बना ली थी। उनकी बेबाक बयानबाजी को लोग पसंद कर रहे थे। हालांकि चुनावी मौसम में कुछ भाषण उनके ऐसे हुए जिनको लेकर भाजपा में बहुत बैचेनी देखी गई है। उनके निशाने पर सबसे ज्यादा भाजपा रही। उन्होंने अपने भाषण में सरकारों को आतंकी और तालिबानी तक बोल दिया। यहीं से आकाश की बोलती पर पाबंदी लगाने की संभावनाएं बढ़ गई थी। शिक्षित आकाश आनंद ने अपने भाषण के दौरान ही चुनाव आयोग को संबोधित करते हुए कहा था कि हो सकता है कि उनके भाषणों से किसी को परेशानी हो और आयोग उन्हें नोटिस भेजे लेकिन वो जो कह रहे हैं वो सत्य है और आयोग को हकीकत देखना है कि तो मौके पर आये और देखे कि लोग सरकार से कितने दुखी है। आज बसपा प्रमुख मायावती कहती है कि आकाश आनंद में परिपक्वता की कमी है और इसी कारण उन्हें सभी पदों से हटाया जा रहा है एवं उत्तराधिकारी भी अब वो उनके नहीं होंगे। तो परिपक्वता किसमें नहीं है ये भी सवाल खड़ा होता है। जब मायावती ने आकाश आनंद को जिम्मेदारी दी थी तब उनकी परिपक्वता नहीं देखी थी। चुनावी मौसम के बीच में अब परिपक्वता की बात हो रही है। इसलिए जो आरोप कांगे्रस व अन्य दल लगा रहे हैं कि मायावती ने किसी ना किसी दबाव में आकाश आनंद को हटाया है क्योंकि वो जमीनी हकीकत देख रहे हैं उसी पर बोल रहे थे। जो शायद किसी खास दल को पसंद नहीं आ रहा था। कांगे्रस नेताओं का ये भी आरोप है कि शायद मायावती ्रआकाश आनंद को ये बताना भूल गई कि खास दल के बारे में कुछ नहीं बोलना है। बहरहाल, जो कुछ भी हो लेकिन आकाश आनंद जैसे युवा नेता पर पाबंदी लगाना, उनको परिपक्व ना मानना एक बड़ा सवाल है। आज की युवा पीढ़ी के लिए भी ये ऐसा फैसला है कि आखिरकार वो क्या बोले और क्या ना बोले। बूढ़े हो चुके नेता आज भी युवा पीढ़ी को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं ये भी कहां तक ठीक है। ये ठीक है कि भाषणों में शब्दों का चयन ठीक होना चाहिए लेकिन किसी के भाव को दबाना भी ठीक नहीं है। मायावती का ये फैसला उन्हीं के समाज में बहुत चर्चा का विषय बना हुआ है। जय हिंद