रोहित शर्मा
गाजिायबाद। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। विधानसभा चुनाव में रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी के पास खोने को कुछ नहीं है जबकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पास पश्चिमी यूपी की जमीन से पाने के लिए बहुत कुछ है। ऐसे में दोनों ही नेता और मेरठ की क्रांतिकारी जमीन से अपने राजनीतिक गठबंधन का आगाज करने जा रहे हैं। रालोद और समाजवादी पार्टी की संयुक्त रैली आज मेरठ जनपद के सिवाल खास विधानसभा क्षेत्र के बदथुआ में है। रैली को ‘संयुक्त परिवर्तन रैली’ नाम दिया गया है। रैली को लेकर समाजवादी पार्टी और रालोद के नेता खासे उत्साहित हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के मिलते हुए हाथ क्या पश्चिमी यूपी के जाटलैंड का कोई सियासी जादू चलाकर परिवर्तन का संदेश दे पाएंगे?
राष्ट्रीय लोकदल की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल साथ-साथ आए हैं। रालोद अपना बुरा दौर खत्म करने के लिए सपा के साथ गठबंधन कर राजनीतिक मैदान में है। पार्टी की कमान इस बार युवा अध्यक्ष जयंत चौधरी के हाथों में है। पिछला विधानसभा चुनाव जयंत चौधरी के पिता चौधरी अजित सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया था। सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद द्वारा किए गए गठबंधन के सभी प्रयास फेल हो गए थे। शायद मुजफ्फरनगर कांड का भूत रालोद का पीछा नहीं छोड़ रहा था। चुनाव में रालोद बागपत की छपरौली विधानसभा सीट पर जीत दर्ज कर पाई थी। इस सीट पर रालोद के सहेंद्र सिंह रमाला चुनाव जीते थे। बाद में वो भी रालोद छोड़कर भाजपा में चले गए थे। मौजूद समय में उत्तर प्रदेश के किसी भी सदन में रालोद का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नहीं है। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो रालोद का ग्राफ लगातार नीचे की ओर आया है। सन् 2002 में रालोद ने प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में 14 सीटों पर जीत दर्ज की थी। सन् 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में रालोद की सीटें घटकर 8 रह गई थीं। सन् 2012 में कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के बावजूद भी रालोद के खेमे में मात्र 9 विधानसभा सीटें पार्टी के खाते में आई थीं।
आगामी विधानसभा चुनाव में होने वाले इस गठबंधन को लेकर चर्चा है कि 36 सीटें रालोद के खाते में आ रही हैं। रालोद के खाते में आने वाली लगभग सभी सीटें पश्चिमी यूपी के जाटलैंड से हैं। यानि, रालोद के खाते में आने वाली अधिकतर सीटें ऐसी हैं जहां जट मतदाताओं की तूती बोलती है। पिछले विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो जाटों का अधिकतर वोट भाजपा के खाते में गया था। यही कारण है कि रालोद को अपनी राजनीति का सबसे बुरा दौर देखना पड़ा था। इस बार राष्ट्रीय लोकदल किसान आंदोलन से ऑक्सीजन लेकर विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। जयंत चौधरी ने अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए अखिलेश यादव से हाथ मिलाया है। आज मेरठ के दबथुआ में होने वाली अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की रैली को ‘संयुक्त परिवर्तन रैली’ नाम दिया गया है। अब देखना होगा कि जाटलैंड की सरजमीं से दोनों राजनीतिक दल मिलकर परिवर्तन पश्चिमी यूपी में परिवर्तन का क्या संदेश दे पाते हैं।