वरिष्ठ संवाददाता
गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश में इसी साल नगर निकाय चुनाव होने हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस निकाय चुनाव की ओर कदम बढ़ाती हुई नजर आ रही थी। हाईकमान की हरी झंडी के बाद महानगर कांग्रेस कमेटी ने पार्षद पद के टिकट के दावेदारों के आवेदन स्वीकार करने भी शुरू कर दिए थे। हां, पार्षद जितेन्द्र पाल की कांग्रेस में ज्वॉइनिंग का मामला ऐसा फंसा की दावेदारी पर वीराम ही लग गया। दरअसल, ‘नीयत’ की कसौटी पर पार्षद जितेन्द्र पाल खरा नहीं उतर पाए। अब बड़ा सवाल है कि नगर निकाय चुनाव के दौरान कांग्रेस हाईकमान क्या नीयत की कसौटी पर कसकर ही पार्षद के टिकट वितरित करेगा। यदि, ऐसा है तो पार्टी हाईकमान की नजरों में दावेदार की नीयत परखने की फॉर्मूला आखिर कैसा होगा?
काबिलेगौर है कि पार्षदों की अपनी अलग ही दुनिया होती है। पार्टी एक बार टिकट देकर जिता दे तो पार्षद ज्यादा कुछ मतलब नहीं रखते। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में तो हालात कुछ ऐसे ही हैं। पार्षद पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतते हैं और उसके बाद चंद पार्षद ही पार्टी कार्यक्रमों में नजर आते हैं। कुछ पार्षद तो ऐसे हैं कि चुनाव से पूर्व टिकट की आस में उनके पांव पार्टी कार्यालय पर लगातार पड़ते हैं, लेकिन उसके बाद जैसे वे रास्ता ही भूल जाते हैं। वर्तमान में भी कांग्रेस के 12 पार्षदों में से एक या दो ही पार्टी के कार्यक्रमों में नजर आते हैं। कांग्रेस में पिछले दिनों पार्षद जितेन्द्र पाल की ज्वॉइनिंग को लेकर भूचाल आ गया था। दरअसल, जितेन्द्र पाल पिछला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर जीते थे, उसके बाद वे शायद ही पार्टी कार्यालय आए हों। हां, विधानसभा चुनाव के दौरान जितेन्द्र पाल समेत चार पार्षदों ने समाजवादी पार्टी ज्वॉइन कर ली थी। कांग्रेस से सपा में गए पार्षदों की नीयत साफ थी कि से सत्ता सुख की चाह में कांग्रेस का हाथ छोडक़र गए हैं। चुनाव में सपा हारी तो जितेन्द्र पाल ने फिर से कांग्रेस का रुख किया। उसके बाद जो बवाल हुआ वो सबके सामने है। इस प्रकरण में कांग्रेस हाईकमान को बाकायदा दखल देना पड़ा। बड़ा सवाल अब इसी साल होने वाले निकाय चुनाव को लेकर उठ रहा है। जितेन्द्र पाल प्रकरण के बाद कांग्रेस नीयत की कसौटी पर पार्षद टिकट के दावेदारों को कसने के लिए कौन सा मापदंड अपनाएगी। किस तरह से टिकट मांग रहे दावेदारों को ईमानदारी और नेकनियती की कसौटी पर कसा जाएगा। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में पार्षदों के कारण पहले पार्टी की किरकिरी ना हुई हो। पार्षद की नीयत में खोट के कई उदाहरण पार्टी में सामने आ चुके हैं। चंद पार्षदों की नीयत में खोट का खामियाजा पार्टी को एक जीता जिताया चुनाव हारकर भुगतना पड़ा था।
वर्तमान में फिर से नगर निगम चुनाव की तैयारियों के लिए बिगुल फूंका जाएगा। पार्षद फिर हाथों में दावेदारी का पर्चा लेकर कांग्रेस कार्यालय के चक्कर लगाएंगे। हां, उस दौरान भी जितेन्द्र पाल प्रकरण कांग्रेस के गलियारो में गूंजेगा। नेकनियती और बेईमानी का एक बार फिर परीक्षण किया जाएगा। पार्टी परखेगी की चुनाव में कौन टिकट देने के योग्य है या नहीं है? देखना दिलचस्प होगा कि पूर्व में कांग्रेस को जोर का झटका धीरे से दे चुके दावेदारों को भी क्या पार्टी गले लगाएगी? क्या कांगे्रस में फिर से पुराना इतिहास दोहराया जाएगा या पुरानी गलितयों से सबक लेकर कांग्रेस आगे बढ़ेगी?