युग करवट संवाददाता
गाजियाबाद। विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की सरकार है। आने वाला समय नगर निगम चुनाव का है, इसमें गाजियाबाद को नया महापौर और पार्षद मिलेंगे। लोकसभा चुनाव में अभी लगभग दो साल का समय बचा है। कांग्रेस की बात की जाए तो पार्टी में लोकसभा चुनाव के लिए तो कांग्रेसी ताल ठोकने लगे हैं, लेकिन नगर निगम चुनाव को लेकर कांग्रेसियों की जुबान पर ताला जड़ा है। महापौर पद के लिए कौन मैदान में होगा इसे लेकर किसी प्रकार की कोई सुगबुगाहट पार्टी में नहीं है।
दरअसल, नगर निगम चुनाव इसी साल में संपन्न कराए जाने हैं। ऐसे में शासन की ओर से आरक्षण की प्रक्रिया भी कराई जाएगी। हर साल होने वाली आरक्षण की प्रक्रिया के बावजूद भी महापौर का चुनाव लडऩे वालों में प्रतिस्पर्धा चालू रहती थी। आरक्षण में महापौर सीट किसी भी कोटे में जाए चुनाव लडऩे वाले अपने पत्ते खोलने शुरू कर देते थे। चुनाव की तैयारियां राजनीतिक महौल को गर्म बनाए रखती थीं। कांग्रेस की बात की जाए तो महापौर पद के लिए अभी तक कांग्रेसियों की जुबान पर पूरी तरह से ताला जड़ा है। आरक्षण का ऊंट किस करवट बैठेगा और कौन कैंडिडेट होगा, इसे लेकर एक शब्द तक कांग्रेसियों की जुबान से नहीं फूट रहा है। लगता है कि विधानसभा चुनाव परिणाम के आघात ने चर्चाओं की मंडी को भी पूरी तरह से ठंडा कर दिया है। उधर, नगर निगम चुनाव जहां इसी साल होने हैं, वहीं लोकसभा चुनाव में अभी समय बाकी है। कांग्रेस में लोकसभा चुनाव को लेकर सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। गत दिनों महानगर कांग्रेस कमेटी पर नगर निगम कार्यकारिणी का चुनाव जीतने वाली महिला पार्षद पार्वती रावत सम्मान में एक समारोह आयोजित किया गया। कार्यकारिणी चुनाव ही सही, जीत का जश्न मनाने का कांग्रेसियों को कम से कम मौका तो मिला था।
इस मौके को भुनाने की कांग्रेसियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सम्मान के लिए फूल मालाएं तो पहनाई ही गईं, लगे हाथ लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी का ऐलान भी महानगर कांग्रेस कमेटी कार्यालय से कर दिया गया था। जबकि, सह प्रक्रिया पूरी तरह महानगर कांग्रेस कमेटी के कार्यक्षेत्र से उलट थी। दरअसल, महानगर कांग्रेस कि कार्यक्षेत्र में नगर निगम पूरी तरह से आता है। शहर के सभी 100 वार्डों पर कांग्रेस को पार्षद और महापौर का चुनाव लडऩा महानगर कांग्रेस कमेटी का कार्यक्षेत्र है। सांसद के चुनाव की प्रक्रिया जिला और महानगर कांग्रेस कमेटियां मिलकर संपन्न कराती हैं। यूं कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि सांसद का चुनाव लडऩा महानगर से ज्यादा जिले के अधिकार क्षेत्र में है। ऐसे में महानगर कार्यालय से महापौर प्रत्याशी से पूर्व सांसद कैंडिडेट के लिए आवाज उठना कुछ अटपटा लगता है।
काबिलेगौर है कि कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जो लोकसभा और विधानसभा चुनाव शिद्दत के साथ लड़ती है। पार्टी हाईकमान इसमें पूरी ताकत झोंकता है, लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में टिकट के साथ पार्टी चुनाव प्रचार सामग्री और फंड भी उपलब्ध कराती है। इसके उलट महापौर के चुनाव में पूरी जिम्मेदारी पार्टी प्रत्याशी के कंधों पर होती है। उसे सिर्फ पार्टी की ओर से सिंबल ही मिल पाता है। चुनाव लडऩे का बाकी पूरा खर्च पार्टी प्रत्याशी की जेब पर पड़ता है। ऐसे में साफ है कि कांग्रेस में चुनाव लडक़र हार हो या जीत यह दूर की कौड़ी है। हां, इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव लडऩा कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए हमेशा से ही फायदे का सौदा रहा है।
2012 के चुनाव में विजय चौधरी ने मजबूती से ठोकी थी ताल!
गाजियाबाद। महापौर का चुनाव हो और कांग्रेस में 2012 के चुनाव का जिक्र ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। 2012 में महापौर की सीट ओबीसी कोटे में आरक्षित हो गई थी। इससे पूर्व ही कांग्रेस के नेता विजय चौधरी टिकट के लिए मैदान में कूद पड़े थे। उन्होंने साफ कर दिया था कि सीट चाहे सामान्य रहे या फिर ओबीसी कोटे में जाए, कांग्रेस की ओर से वे मजबूत प्रत्याशी बनकर ताल ठोक रहे हैं। आरक्षण से पूर्व उनके चुनाव लडऩे की मंशा ने सन् 2012 के महापौर चुनाव को रोमांचक बना दिया था। उनके मैदान में आने से महारथियों के हार जीत के समीकरण बनने और बिगडऩे लगे थे। एक मजबूत प्रत्याशी की तरह उन्होंने चुनाव भी लड़ा था।