(भाग तीन)
भारतीय इमिग्रेशन सेंटर पर सीमा सुरक्षा बल का कड़ा पहरा था। हालांकि गिनती तो नहीं की जा सकी मगर सुरक्षा कर्मियों समेत तमाम स्टाफ और सफाई कर्मियों को मिला लें तो कम से कम दो ढाई सौ लोग तो जरूर रहे होंगे। भारतीय टीम द्वारा हमें इलेक्ट्रिक वाहन के मार्फत सीमा पर स्थित पाकिस्तान इमिग्रेशन सेंटर तक पहुंचाया गया। बेशक तमाम अन्य सुविधाओं की तरह यह भी निशुल्क थी। पाकिस्तान पहुंचते ही लोग, भाषा, पहनावा और व्यवहार एक दम बदल गया। भारतीय कर्मचारी में जहां हमें इस यात्रा पर भेजने के लिए कोई उत्साह नहीं था वहीं मात्र सौ मीटर दूर पाकिस्तानी चेहरों पर बला की मुस्कान थी। चूंकि मेरे पूर्वज पश्चिमी पंजाब के ही रहने वाले थे अत: स्थानीय पंजाबी भाषा में सिद्धस्त होने का लाभ मैंने उठाया और उनकी ज़बान में खूब गपशप की। हमारे प्रपत्रों की जांच की मात्र औपचारिकता ही उधर निभाई गई। हां यह जरूर था कि प्रति यात्री बीस डॉलर की दर से उन्होंने हमसे फीस अवश्य वसूली। इसके बाद यहां भी छह सीट वाली उनकी एक इलैक्ट्रिक गाड़ी मौजूद थी जो हमें लेकर करतारपुर के लिए चल दी। हालांकि भारत की तरह यहां भी अनेक एसी बसें खड़ी थीं मगर तीन लोगों के लिए भला बस की भी कोई क्या जरूरत महसूस करता।
सुंदर और साफ सुथरी सडक़ पर धीरे-धीरे हमारा वाहन करतारपुर साहेब की ओर बढ़ रहा था। सडक़ के दोनों ओर कंटीले तारों की बाड़ थी। दूर-दूर तक कोई आबादी अथवा यातायात भी नहीं था। लगभग एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही रावी नदी आ गई। यह वही नदी है जिसके किनारे कभी मेरे पूर्वज रहा करते थे। उनका पैतृक शहर ओकाड़ा भी वहां से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर था। ज़ाहिर है कि रावी को देखते ही मन पंजाब की उन कथाओं में खो गया जिसे सुनते-सुनते मैं बड़ा हुआ हूं। रावी नदी पार करते ही करतारपुर का दरबार साहेब गुरुद्वारा नजऱ आना शुरू हो गया। इस पूरे क्षेत्र को बाबा नानक ने ही आबाद किया था। रावी के किनारे ही उनका वह आध्यात्मिक स्थल था जहां अब गुरुद्वारा है। रावी के किनारे ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था। बताते हैं कि उस जगह पर उनकी समाधि भी थी मगर नदी के धारा बदलने से वह स्थान पानी में समा गया। हालांकि इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा में भी बाबा नानक की समाधि है मगर उसके बाबत अनेक अन्य कथाएं हैं। जैसे जैसे हम गुरुद्वारे के निकट पहुंच रहे थे, उसके बड़े आकार का एहसास हो रहा था। फिलवक्त यह गुरुद्वारा 42 एकड़ भूमि पर विकसित है मगर पाकिस्तान सरकार ने उसके लिए पूरे चार सौ एकड़ भूमि अधिग्रहित की है। गुरूद्वारा परिसर के लिए अधिग्रहित जमीन कितनी बड़ी है इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि अयोध्या के निर्माणाधीन राम मंदिर का परिसर कुल सत्तर एकड़ है।
खैर, गुरूद्वारा परिसर में एक गाइड हमारा इंतजार कर रहा था। वह स्थानीय पर्यटन विभाग का कर्मचारी था। उसने हमें पूरे परिसर के बाबत विस्तार से बताया और फिर हमें भ्रमण के लिए अकेला छोड़ दिया। सबसे पहले हम परिसर के केन्द्र में बने गुरुद्वारे में ही गए। बेशक पूरा परिसर बहुत बड़ा है मगर इस गुरुद्वारे का मूल स्वरूप सुरक्षित रखने की गरज से उसमे कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई है। पहली मंजिल पर जहां गुरू ग्रंथ साहब का प्रकाश हो रहा है वह कमरा तो मात्र बीस फुट बाई पच्चीस फुट का ही है और उसने एक वक्त में बामुश्किल पचास आदमी ही खड़े हो सकते हैं। गुरुद्वारे में माथा टेक कर हम लोग पूरे परिसर को देखने निकले तो वहां एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाली चीजें हमें नजर आईं।
क्रमश: