(भाग चार)
करतारपुर गुरुद्वारा परिसर में देखने योग्य एक से बढ़ कर एक चीजें हैं। सबसे महत्वपूर्ण तो बाबा नानक की मजार ही है जो पिछले पांच सौ सालों से यहां श्रद्धा का बड़ा केन्द्र है। सिख और हिंदू संगत के अतिरिक्त स्थानीय मुस्लिम आबादी भी इस मजार पर बड़ी संख्या में माथा टेकने आती है। बाबा नानक के जीते जी ही मुस्लिमों ने उन्हें पीर की संज्ञा दे दी थी और आज भी वे मुस्लिमों के दिलों में बसते हैं। यह मजार ठीक वहीं है जहां बाबा नानक ने अपना शरीर छोड़ा था। पास में ही रहट युक्त एक कुंआ भी है। बताया जाता है कि इसी से बाबा अपने खेतों की सिंचाई करते थे। गुरुद्वारे के जीर्णोद्धार के समय तीन साल पहले पांच सौ साल पुराना एक और कुआं मिला था और माना गया कि यह भी बाबा नानक से संबंधित है। पाकिस्तान सरकार ने सिक्खों की परम्परा के अनुरूप परिसर में सरोवर का भी निर्माण करवाया है। हालांकि सिख धर्म की मान्यताओं के अनुरूप स्त्रियों और पुरुषों के लिए एक ही सरोवर न बनवा कर दोनों के लिए अलग अलग सरोवर बनवाए गए हैं। जाहिर है कि इस मामले में सिक्ख नहीं इस्लामिक जीवन शैली को तरजीह दी गई है। परिसर में बहुत बड़ा लंगर हॉल भी है जहां एक साथ दो हजार लोग बैठकर भोजन कर सकते हैं। लगभग इतने ही यात्रियों के ठहरने को भी कमरे और डॉरमेट्री वहां है। अब इस कॉरीडोर का निर्माण और गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार राजनेताओं ने कराया है तो जाहिर है कि राजनीति भी यहां अपने पदचिन्ह छोड़ गई है।
पाकिस्तान सरकार ने दावा किया था कि करतारपुर दुनिया का सबसे बड़ा गुरुद्वारा बनने जा रहा है। अपनी इस घोषणा को यथार्थवादी दिखाने को उसने गुरुद्वारे के लिए कुल 1450 एकड़ भूमि चिन्हित की थी मगर अधिग्रहण अभी तक मात्र चार सौ एकड़ भूमि का ही हुआ है। दावा किया गया था कि गुरुद्वारे के पास पांच सितारा होटल और अन्य सुविधाएं भी होंगी मगर इमरान खान सरकार के गिरने के बाद पाकिस्तान में अब इनका नामलेवा भी कोई नहीं बचा है। पाकिस्तान में कुल 195 बड़े गुरुद्वारे हैं और लगभग सभी का संचालन और देखभाल पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी करती है मगर करतारपुर साहेब से कमेटी को दूर ही रखा गया है और स्वयं सरकार इसका संचालन कर रही है। यहां तक कि नौ सदस्यीय संचालन समिति में एक भी सिख नहीं है। सबसे बड़ी राजनीतिक शरारत तो स्वयं इमरान ख़ान सरकार ने की और गुरुद्वारे के ठीक बगल में एक चबूतरा सा बनाकर उसपर एक बोर्ड लगा दिया कि साल 1971 की लड़ाई में भारत ने इस गुरुद्वारे को नष्ट करने के लिए यहां एक बम फेंका था मगर गुरू महाराज की कृपा से गुरुद्वारे का रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ। पाकिस्तान की यह हरकत वहां आए हरेक नानक नाम लेवा को नागवार गुजरती होगी मगर इसका कोई खास विरोध अभी तक नहीं हुआ है। भला यह कोई कैसे मान सकता है कि भारतीय सेना, जिसमें सिख बड़ी तादाद में हैं, वह अपने इतने महत्वपूर्ण धर्मस्थल को नष्ट करने की चेष्टा करेगी। खैर, इसके बाद हम लोग लंगर हॉल में गए जहां हमारे अतिरिक्त बस दो दंपति और थे। साफ सुथरी शानदार रसोई में तैयार किया गया लजीज़ भोजन हमारे सामने था और मैं दावे से कह सकता हूं कि यह भोजन भारत के किसी भी बड़े से बड़े गुरुद्वारे में परोसे गए लंगर से रत्ती भर भी कमतर नहीं था।
क्रमश: