उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव किसी सनसनीखेज वेब सीरीज ऐसा लगने लगा है। जिसमें अकर्णप्रिय डायलॉग हैं, लफ्फाजी है, कीचड़ उछाली है, सांकेतिक गालियां हैं और बेवजह बज रही तालियां हैं। जिसका जो मन हो रहा है, कह रहा है। कोई बामुश्किल पत्थर पर पांव टिकाए खड़ा है, तो कोई किसी लहर में बह रहा है। इस ‘चुनावी सीरीज’ में हास्य है, हुडदंग है, रोचकता है, रोमांच है, धमकी है, बहलावा है, बहकावा है, तमाशा ही तमाशा है। नेताओं का अभिनय है, दावे-वादे वाले संवाद हैं। आप-हम बोले तो, जनता दर्शक है, जो मजा तो ले रहे हैं, लेकिन असमंजस में है क्योंकि मुद्दे गायब हैं। मुद्दा-विहीन चुनाव प्रचार का एक ही मुद्दा है, सत्ता पर काबिज होना है।
इन चुनावों में एक इतिहास तो जरूर लिखा जा रहा है कि देश का गृहमंत्री गली-गली घूमकर द्वार-द्वार जाकर लोगों को अपनी पार्टी और प्रत्याशी के पक्ष वाले पर्चे बांट रहा है। आज तक के ‘सबसे मजबूत’ और यशस्वी मुख्यमंत्री गांव-गली में पैदल घूम कर लोगों से भाजपा को वोट देने की गुहार लगा रहे हैं ताकि पद और पदवी बरकरार रहे।
मुख्यमंत्री योगी और देश के गृहमंत्री अमित शाह की भाषा विपक्ष को धमकाने-हडक़ाने वाली है। योगी जी कहते हैं -‘अभी कैराना और मुजफ्फरनगर में जो थोड़ी बहुत गर्मी दिखाई दे रही है, 10 मार्च के बाद उसे निकाल दिया जाएगा। मैं वो हूं जो जून की गर्मी में भी शिमला बना देता हूं। अमित शाह कहते हैं -‘अखिलेश बाबू, अपने आप में रहिए यूपी में भाजपा की सरकार है।’ और तो और देश के प्रधानमंत्री की भाषा भी उत्तर प्रदेश के लिए वर्चुअल रैली में योगी-शाह से बहुत अलग नहीं थी। पीएम भी समाजवादी सरकार को गुंडों, दबंगों, माफिया वालों की सरकार बता-बता कर गरिया रहे हैं, कोस रहे हैं। अपनी भाषा पर नियंत्रण न रखने वाले भाजपा के दिग्गज नेता बात-बात में कैराना और मुजफ्फरनगर के दंगों को उछाल कर ध्रुवीकरण का खेल खेल रहे हैं। लेकिन लोग भाजपा की चाल को समझ रहे हैं और अभी तक तो समझदारी का परिचय देते हुए खामोश हैं।
भाजपा चुनाव प्रचार में विपक्षी दलों खासतौर से सपा और कांग्रेस को परिवारवाद की राजनीति करने के आरोप लगाकर भी लोगों को यह पूछने से रोक पाने में सफल नहीं हो पा रही है कि भाजपा का अपने नेताओं के परिवारवाद के बारे में क्या कहना है? इसी तरह भाजपा सपा को गुंडों की पार्टी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही, लेकिन जब उससे पूछा जाता है कि योगी सरकार में स्वयं मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित अनेक नेताओं और दर्जनों विधायकों पर आपराधिक अतीत है, तो भाजपा के नेता विपक्ष पर ज्यादा जोर-शोर से हमले शुरू कर देते हैं। लेकिन इससे सच्चाई दब तो नहीं जाती है। यदि भाजपा को अपराध और अपराधियों से इतनी ही चिढ़ है, नफरत है तो इन चुनावों में भी करीब 70-80 अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं को अपना उम्मीदवार क्यों बनाया है? दूसरे दलों के दागी तो अपराधी, अपने दल के दागी दूध से नहाए हुए, यह दोहरा चरित्र है।
बात मुद्दे की यह है कि इस बार के चुनाव में कोई मुद्दा है ही नहीं। भाजपा को जनता से अपेक्षा है कि वह अयोध्या काशी और मथुरा जैसे तीर्थों के उद्धार के लिए उसके हाथ मजबूत करे, जबकि विपक्ष लोगों को पिछले 5 वर्षों में हुई फर्जी मुठभेड़ों और दमन की घटनाओं को याद रखते हुए वोट देने को कह रहा है। शुरू-शुरू में तो लगा था कि ताजा चुनाव संभवत: सडक़, हवाई अड्डा बनवाने, विकास की बिना डोर वाली पतंग उड़ाने के नाम पर लड़ा जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि सत्तापक्ष को अंदाजा हो गया कि यह कथित विकास परियोजनाएं तमाम लोगों का विस्थापन और अनेक अनेक परिवारों की बर्बादी भी अपने साथ लाई हैं। परिणाम यह हुआ कि 25 करोड़ का आंकड़ा छूने जा रही आबादी वाले उत्तर प्रदेश का चुनाव उत्तेजना और जाति धर्म की धुरी पर घूमने लगा है। रोजगार, महंगाई, गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस उत्पीडऩ की बात करने वालों के हाथों में जाति-धर्म की जलेबी का दोना रख दिया जा रहा है, ताकि मतदान तक लोग ‘प्रसाद’ का आनंद लें और कुछ बोलें नहीं।