वाराणसी में नामांकन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुश्मनों के लिए सख्त होने साथ-साथ नरम दिल भी दखते हैं। जब वो वाराणसी नामांकन करने से पहले मां गंगा का आशीर्वाद लेने गये तो वो भावुक हो गये और उनके आंसू नहीं रूक पाये। ऐसा नहीं है कि वो पहली बार भावुक हुए इससे पहले भी कई मौकों पर वो भावुक हो चुके हैं। क्योंकि चुनाव के दौरान वो भावुक हुए तो जाहिर है कि चर्चा कुछ ज्यादा हो गई। मां गंगा का आशीर्वाद जब वो ले रहे थे तो सारे चैनल लाइव दिखा रहे थे। इसीलिए उनके आंसू भी लाइव हो गये और पूरे देश ने देखा। मगर चुनावी मौसम में आंसुओं पर चर्चा ना हो ये कैसे हो सकता है। हमारे यहां चुनाव एक ऐसा मौका होता है जिसमें विकास की बातें कम और दिल की भड़ास ज्यादा निकाली जाती है। कोई भी दल ऐसा नहीं होता जो एक दूसरे पर निजी हमले नहीं करता हो। कभी-कभी तो ये मिसाल दी जाती है कि आने दो चुनाव इसको तब बताएंगे। इस तरह की राजनीति के कारण ही मतदान प्रतिशत भी कम होने लगा है लेकिन कोई भी नेता ये बात समझने को तैयार नहीं है। मैं चर्चा कर रहा था प्रधानमंत्री के आंसुओं पर होने वाली राजनीति की। क्या आंसू अपने आप निकल सकते हैं। जिसका दिल साफ होता है आंसू उसी के निकलते हैं ऐसा हमने सुना है। फिल्मों में ग्लिसरीन लगाकर आंसू लाये जाते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में अगर कोई भावुक होता है तो वास्तव में उस व्यक्ति को नरम कहा जाता है। बात मोदी जी के आंसुओं की हो तो फिर विपक्ष, सोशल मीडिया कैसे खामोश रह सकता है। ये कहा जा रहा है कि उड़ीसा में हैवानियत हुई तब मोदी जी भावुक नहीं हुए, लखीमपुर खीरी में मंत्री के बेटे ने किसानों पर थार गाड़ी चढ़ा दी तब मोदी जी भावुक नहीं हुए, किसान आंदोलन के दौरान कई सौ किसानों की मौत हो गई तब मोदी जी भावुक नहीं हुए, देश की बेटियां इंसाफ के लिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करती रहीं, पुलिस उन पर लाठियां बरसाती रहीं तब मोदी जी भावुक नहीं हुए, न जाने कितनी ऐसी दर्दनाक घटनाएं हुई तब मोदी जी भावुक नहीं हुए उनका एक भी आंसू नहीं निकला, आज चुनाव में जो माहौल भाजपा के प्रति नहीं बन रहा है तब वो भावुक हो रहे हैं। बहरहाल अब चुनाव के बचे दिनों में आंसुओं पर भी राजनीति होगी। ऐसा सोचा भी नहीं होगा। मोदी जी भावुक होने पर इस शेर के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं-
पत्थर समझता है मेरा चाहने वाला मुझे,
मैं मोम हूं उसने मुझे छूकर नहीं देखा।
जय हिंद