हिन्दी पत्रकारिता दिवस
आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। ३० मई १८२६ को कोलकाता से पहला हिन्दी में साप्ताहिक पत्र निकला था। इससे पहले कोई हिन्दी भाषा में पत्र नहीं निकलता था। हालांकि अन्य भाषाओं में जरूर समाचार पत्र निकलते थे। अफसोस की बात ये है कि हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या कम होने के कारण ये अखबार भी कुछ माह में ही बंद हो गया था। लेकिन जितने दिन भी चला हिन्दी पत्रकारिता को जन्म जरूर दे गया। इसके प्रकाशक पं. जुगल किशोर शुक्ल थे। दशक बदलते गये, पत्रकारिता बदलती गई और कुछ दशकों से जो पत्रकारिता हो रही है उसको देखकर यही लग रहा है कि आज हम कहां जा रहे हैं। कलम पर अब अंकुश है। पहले के पत्रकार इस पेशे को मिशन के रूप में करते थे और आज ये एक मीडिया हाउस बन गये हैं और इन पर पंूजीपतियों का कब्जा हो गया है। अब अखबार का संपादक वही लिखता है जो उससे लिखवाया जाता है। पंूजीपतियों के हाथ में मीडिया हाउस आने से अब पहले जैसी पत्रकारिता नहीं रही। भले ही पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया हो लेकिन इसमें कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि इस क्षेत्र में भी अन्य क्षेत्रों की तरह गिरावट आयी है। आज अखबार में क्या लिखा जाएगा इसका फैसला संपादकीय विभाग नहीं करता बल्कि मार्केटिंग विभाग करता है। पत्रकारों की कलम की धार खत्म हो गई है। पहले पत्रकार जो देखता था वो लिखता था आज ऐसा नहीं है। खादी का कुर्ता, कंधे पर झोला, आंखों में चश्मा, पतला-दुबला शरीर, पांव में चप्पल और वाहन के नाम पर साईकिल ये पत्रकार की पहचान थी। बड़े से बड़े अखबार भी वेतन के नाम पर बहुत कम दिया करते थे लेकिन उक्त वेशभूषा वाले पत्रकारों की कलम की धार ऐसी होती थी कि वो सत्ता को भी हिला देती थी। उनके पहनावे भले ही देशी होते थे लेकिन कमल की धार किसी तलवार की धार से कम नहीं होती थी। आज ऐसा नहीं है। आज रिपोर्टिंग करने के लिए हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल होता है। आज क्या खबर लिखी जाएगी और क्या चलाई जाएगी इसका फैसला बड़े घराने करते हैं। आज आप पत्रकार हैं लेकिन कलम आपका आजाद नहीं है। देश के नामचीन पत्रकार नौकरी को मोहताज हो गये हैं। यू-ट्यूब के सहारे अपना परिवार पाल रहे हैं। 1826 में अंगे्रजों को अपने कलम से लोहा मनवाने वाले पत्रकार आज की स्थिति देखते तो अपने आप से शर्मिंदा होते। बदलाव आना अच्छा, तरक्की भी करना अच्छा है, लेकिन हमें अपनी कलम की धार को हल्का करना नहीं चाहिए। आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर सभी श्रमजीवी पत्रकारों को हार्दिक बधाई के साथ-साथ ये भी कहना चाहूंगा कि अपनी कलम की बेबाकी को बनाये रखे क्योंकि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और इसे कमजोर ना होने दें। आज भी भले ही इस क्षेत्र में कितनी भी गिरावट आयी है लेकिन आज भी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती तो वो मीडिया के पास आते हैं, मीडिया पर भरोसा करते हैं इसलिए इस भरोसे को कायम रखें। जय हिंद