एक लंबे अरसे बाद भाजपा का विधानसभा के बाद विधान परिषद में भी बहुमत हो गया है। ३६ सीटों पर एमएलसी चुनाव के लिये वोट डाले गए थे जिसमें से ३३ सीटें भाजपा के खाते में चली गईं, जबकि तीन सीटें अन्य के खातों में गई हैं। ३६ में से ३३ सीटें जीतना अपने आप में बड़ी बात है, लेकिन अगर इन प्रचण्ड बहुमत के बीच अगर बनारस और आजमगढ़ जैसे इलाकों में भाजपा और सपा को जीत नहीं मिलती है तो ये बड़ा सवाल है और इस पर आत्ममंथन होना चाहिए। दरअसल इन सीटों पर मैं चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि क्योंकि बनारस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और इस सीट से अगर भाजपा उम्मीदवार की हार होती है तो जाहिर है ये अपने आप में एक बड़ा संदेश है। आजमगढ़ की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि हाल ही में हुए विधानसभा के चुनाव में दस की दस विधानसभा सीटें समाजवादी पार्टी ने जीती थीं। आजमगढ़ में भी निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज कराई। जाहिर है सपा के लिए इस सीट पर हार बड़ा संकेत है। हालांकि ३६ में से एक सीट भी सपा नहीं जीत पाई, अधिकतर सीटों पर उसके प्रत्याशी कुछ खास नहीं कर सके और अभी हाल ही में पश्चिम में रालोद के साथ मिलकर सपा और रालोद ने कई सीटें जीती थीं। एमएलसी के चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन उम्मीदवार २१८ वोट ही ले पाये। जाहिर है कि ये बहुत बड़ा आईना है। बात बनारस की करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में निर्दलीय उम्मीदवार अन्नपूर्णा सिंह ने इस बात का एहसास करा दिया कि यहां जमीनी हकीकत क्या है। इसलिए ३६ में से ३३ सीटें जीतकर भले ही भाजपा गद्गद् हो, लेकिन जब देश के यशस्वी प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में अगर भाजपा हारती है तो आत्ममंथन तो बनता ही है। कुछ सीटें ऐसी होती हैं कि वे हारने पर चर्चा का विषय बनती हैं। बहरहाल भाजपा को जीत पर खुशी के साथ-साथ इस बात पर भी आत्ममंथन करने की जरूरत है कि बनारस में भाजपा को क्यों हार मिली। क्योंकि कभी-कभी इस तरह की हारें बड़ा संकेत दे देती हैं। अगर सारी सीटें जीत जाए और घर की सीट ही हार जाये तो सवाल तो खड़े होते ही हैं।
इस शेर के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूं…
‘‘ कि अंजुम में जीतकर भी ये सोचती रही
कि जो हारकर गया बड़ा खुशनसीब था’’
– जय हिन्द।