एक नवंबर १९९४ को अपनी जान की बाजी लगाकर विदेशों में भारत का सिर ऊंचा करने वाले जांबाज शहीद ध्रुवलाल यादव और राजेश यादव को आज एक बार फिर गाजियाबाद भूल गया। एक नवंबर १९९४ को आतंकवादियों के चंगुल से विदेशी नागरिकों को अपनी जान की कुर्बानी देकर रिहा कराने वाले ध्रुवलाल यादव को आज मोहननगर स्थित उनकी प्रतिमा पर चंद लोग ही उनकी शहादत को नमन करने पहुंचे। कितना दुखद पहलू है कि पुलिस विभाग का कोई अधिकारी आज उन्हें नमन करने नहीं पहुंचा। साहिबाबाद थाना क्षेत्र के प्रभारी रहते हुए ध्रुवलाल यादव शहीद हुए थे, आज उस क्षेत्र के पुलिसकर्मी भी उन्हें याद करने नहीं पहुंचे। आखिरकार इसके पीछे क्या कारण है ये बड़ा सवाल है। ऐसा भी नहीं है कि किसी को आज का दिन याद भी नहीं रहा हो। लगातार कई दिन से मीडिया में एक नवंबर को श्रद्घांजलि देने की सूचनाएं प्रकाशित हो रही थीं। लोगों से अपील भी की जा रही थी कि एक नवंबर को पहुंचकर ध्रुवलाल यादव को उनकी शहादत पर नमन करें। ये वही ध्रुवलाल यादव हैं जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी देकर ब्रिटेन सहित कई देशों के नागरिकों को गाजियाबाद के मसूरी थाना क्षेत्र और सहारनपुर से रिहा कराया था। इसी दौरान वह आतंकियों की गोली से शहीद हो गए थे। उनकी शहादत को लेकर व्हाइट हाउस में बाकायदा कंडोलेंस हुई थी। ब्रिटेन में भी उनकी कुर्बानी को याद करते हुए नमन किया गया था और भारत सरकार को आभार व्यक्त किया गया था कि उन्होंने उनके नागरिकों को सकुशल रिहा कराया। आज उन्हीं ध्रुवलाल यादव की शहादत पर मोहननगर स्थित उनकी प्रतिमा पर आयोजित श्रद्घांजलि में चंद लोग ही शामिल हुए और ये वही लोग हैं जो हर साल आते हैं। अफसोस की बात तो ये है कि कुछ ही नेता वहां उनकी शहादत को नमन करने पहुंचे जबकि ज्यादातर ने इससे दूरी बनाये रखी। शहीदों को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले राजनीतिक दलों के लोग भी नदारद रहे। अफसोस इस बात का है कि पुलिस का एक जवान भी जांबाज इंस्पेक्टर की शहादत को नमन करने नहीं पहुंचा। हो सकता है कि कहीं ना कहीं इसमें भी कोई राजनीति हो, लेकिन शहीदों पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। शहीद को नमन करना चाहिए, क्योंकि शहीदों को नमन ही उनको असली श्रद्घांजलि होती है। हम शहीदों को और उनकी शहादत को भूलने लगेंगे तो फिर क्या होगा, ये बताने की जरूरत नहीं है। युग करवट परिवार की ओर से शहीद ध्रुवलाल यादव और राजेश यादव को शत-शत नमन।
– जय हिन्द।