गाजियाबाद सीट पर उपचुनाव
गाजियाबाद (युग करवट)। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर जिस तरह जीत का मार्जन कम हुआ है वो अपने आप में एक बड़ा संदेश है। राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चाओं पर भरोसा करें तो इस बार गाजियाबाद सीट पर होने वाले उपचुनाव में तस्वीर कुछ बदल सकती है। इस बार समीकरण बदलने के पूरे संकेत दिखाई दे रहे हैं। इसी सीट पर कांगे्रस के स्वर्गीय सुरेंद्र प्रकाश गोयल ने बालेश्वर त्यागी को हराकर भाजपा का किला ढहा दिया था।
इसी शहर की सीट पर बसपा के उम्मीदवार स्व. सुरेश चंद बंसल ने भाजपा को हराकर इतिहास रचा था। आज की तस्वीर पर गौर करें तो इस बार भी भाजपा के लिए ये सीट जीतना पहले की तरह आसान नहीं है। यदि गठबंधन से कोई ऐसा चेहरा अपनी किस्मत आजमाता है जिसकी जेब में अपने बल पर 15 हजार वोट है तो फिर वो भाजपा को मजबूत टक्कर ही नहीं दे सकता बल्कि परिणाम भी बदल सकता है। इस बार लोकसभा के चुनाव में एक ऐसा वोट बैंक भाजपा से छटक गया जो उसका मार्जन बढ़ाने में अहम भूमिका रखता था। क्योंकि लोकसभा चुनाव बड़ा चुनाव होता है और इसकी हार-जीत भी बड़ी होती है। विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से अलग होता है। इसलिए राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि ये जरूरी नहीं है कि इस सीट पर भाजपा को ही जीत मिले। यदि कोई मजबूत उम्मीदवार गठबंधन से आता है तो फिर परिणाम बदल सकते हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश में जिस तरह भाजपा को करारी हार मिली है उसका बड़ा संकेत आने वाले २०२७ के विधानसभा चुनाव में देखने को मिलेगा।
गाजियाबाद सीट पर दो या तीन ऐसे नेता है जिनका अपना व्यक्तिगत वोट बैंक है और यदि वो किस्मत आजमाते हैं तो फिर भाजपा के लिए राहें आसान नहीं है। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि गाजियाबाद सीट पर जातिगत समीकरण भी अहम भूमिका रहेगी। भाजपा इस सीट पर वैश्य को लड़़ाती रही है इस बार पंजाबी समाज खुलकर अपनी दावेदारी कर रहा है। पंजाबी समाज भाजपा का कमिटैड वोट है उसके बाद भी उसको कुछ नहीं मिलता। वो बंधुवा मजदूर की तरह ही पार्टी से जुड़ा रहता है। यदि इस बार भाजपा ने किसी मजबूत युवा वैश्य नेता को चुनाव मैदान में उतारा तो फिर भाजपा के लिए जीत के आसार बन सकते हैं। वहीं चर्चा है कि भाजपा इस सीट पर ब्राह्मïण समाज के एक व्यक्ति के लिए पैरवी कर रही है।
वहीं गठबंधन अभी तक इस सीट के लिए विचार नहीं कर पाया है लेकिन हिंडन पार के एक ब्राह्मïण नेता गठबंधन से चुनाव लडऩे का मन बना रहे हैं। वैसे ये ब्राह्मïण नेता चुनाव लडऩे और मैनेजमेंट बहुत मजबूत है। ये चुनावी माहौल बनाने में काफी एक्सपर्ट हैं। वहीं लोगों में चर्चा है कि ये ऐसे भी ब्राह्मïण नेता है जिनको चुनाव लडऩे का लंबा अनुभव है और उनकी जेब में भी अपने व्यक्तिगत कई हजार वोटों की संख्या रहती है। यदि वो इस बार मैदान में आ जाये तो फिर चुनाव परिणाम कुछ भी हो सकता है। बहरहाल अभी चुनाव की घोषणा नहीं हुई है। देखते हैं कि आने वाले समय में और कितने नाम सामने आते हैं।