एक गांव ऐसा जिसे कहते हैं अफसरों की फैक्टरी
लखनऊ (युग करवट)। जौनपुर के माधो पट्टी गांव में हर घर से आईएएस, आईपीएस, आईआरएस हैं। इस गांव को अफसरों की फैक्टरी कहा जाता है। गत दिनों प्रधानमंत्री ने भाषण में इस गांव का जिक्र किया था। 2019 में 878 अफसरों ने वोट डाले थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जौनपुर में थे। यहां चुनावी सभा में उन्होंने मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर स्थित माधोपट्टी गांव का जिक्र अपने भाषण में किया था। इस गांव को अफसर पैदा करने वाली फैक्टरी कहा जाता है। कहा भी क्यों न जाए, गांव में करीब 75 परिवार हैं।
इनके बीच से 50 से अधिक आईएएस, आईपीएस और आईआरएस निकले और देश के अलग-अलग राज्यों में तैनात हैं। पिछले चुनाव में 878 यानी 65 फीसदी अफसरों ने यहां मतदान किया था जबकि बीते पंचायत चुनाव में यह आंकड़ा 78 फीसदी रहा।
इतने अफसर हैं कि ग्रामीणों को ही उनकी संख्या नहीं पता रहती है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि सबसे अधिक अफसर आपके यहां का गांव दे रहा है। इससे ग्रामीण उत्साहित हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने गांव का नाम लिया और उपलब्धि भी बताई। राजनीति से कोसों दूर गांव के लोग कहते हैं कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि पिछले पांच वर्षों में बहुत विकास हुआ है। 1952 में इस गांव से डॉ. इंदुप्रकाश पहले आईएएस बने और यूपीएससी में दूसरी रैंक हासिल की। 1964 में छत्रसाल सिंह ने आईएएस परीक्षा पास और तमिलनाडु के मुख्य सचिव बने। साल 1964 में ही अजय सिंह और 1968 में शशिकांत सिंह आईएएस बने। 1995 में विनय सिंह आईएएस बने और बिहार के मुख्य सचिव बने। 1980 में आशा सिंह, 1982 में ऊषा सिंह और 1983 में इंदु सिंह भी सिविल सर्विस में चुनी गईं। गांव की ही बुजुर्ग लालमनी कहती हैं कि इन सब के अफसर बनने के पीछे माताओं की भूमिका बहुत अहम है।