तीन दिन पहले घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम में सौ रुपए की कमी गई। उसके बाद पेट्रोल और डीजल के दाम दो रुपए प्रति लीटर कम कर दिए गए। अगर आपको लग रहा है कि सरकार शायद अचानक से आम आदमी पर मेहरबान हो गई है तो गलत हैं। हमारे यहां पुरानी कहावत है कि गरीब की थाली में पुलाव है, लगता है कि कहीं चुनाव है। इस कहावत का सार यही है कि अगर सरकार आपको कोई फौरी राहत दे रही है तो समझ लीजिए कि कोई चुनव नजदीक है। अब तो वैसे भी लोकसभा चुनाव सिर पर है और सत्तारूढ भाजपा का नारा है अबकि बार चार सौ पार। अब चार सौ पार का आंकडा छूना है तो आम मतदाता को तो रिझाना ही होगा। यह अलग बात है कि अगर इसी काम को गैर भाजपा दल की सरकार करेगी तो भाजपा के लोग इसे चुनावी रेवड़ी साबित करके ही दम लेंगे। मगर भाजपा यही काम करेगी तो वह लोग इसे जनहित में किया गया काम बताएंगे। जबकि पिछले लंबे समय से कच्चे तेल की कीमतें चीख चीखकर गवाही दे रही थीं कि पेट्रोल, डीजल की कीमतों में कमी कर देनी चाहिए थीं। चुनाव की घोषणा में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं। जनता देख ही रही है कि कैसे दिन रात अनेक घोषणाएं की जा रही हैं, रोजाना ही हजारो-लाखों करोड़ रुपयों के विकास कार्यो के उदघाटन और शिलान्यास किए जा रहे हैं। जनता को बताया जा रहा है कि इससे पहले ऐसी कोई सरकार देश में आई ही नहीं थी। इतना सब तब हो रहा है जबकि विपक्ष सहमा सा है। इस समय विपक्ष पर ना तो मेदी की कोई काट है, ना चुनाव में वोट मांगने के लिए कोई चेहरा, ना चुनाव में देने के लिए कोई मुद्दा ना कोई नारा। सोच कर देखिए कि कहीं इस चुनाव में विपक्ष से भाजपा को कोई टक्कर मिल रही होती तो क्या हालात होते। खैर फिलहाल चुनाव तक दो रुपए लीटर सस्ते पेट्रोल और डीजल का आनंद लीजिए।