अमूमन देखा गया है कि जब कोई घटना होती है तो जोन के बड़े अफसर घटना स्थल पर आते हैं। आना भी चाहिए, क्योंकि इससे मातहत अफसरों पर वारदात को खोलने के लिए एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी बन जाता है। हालांकि इसका एक दूसरा पहलू ये भी है कि जब पुलिस के आला अफसर घटना स्थल पर आते हैं तो वह घटना भी अपने आप बड़ी घटना बन जाती है और फिर अखबारों में प्रमुखता से छपती है। पुलिस की जिम्मेदारी है कि घटना चाहे छोटी हो या बड़ी, उसका खुलासा करने के लिए पूरी मेहनत करनी चाहिए। लेकिन, जिन घटनाओं का संज्ञान लखनऊ में बैठे अफसर या फिर जोन में बैठे अफसर लेते हैं तो फिर वह अपने आप ही बड़ी घटना बन जाती है। काम करने वाले पुलिसकर्मियों को उस समय निराशा होती है जब घटना खुलने पर कोई बड़ा अफसर आकर उनका उत्साह नहीं बढ़ाता, उनकी पीठ नहीं थपथपाता। जबकि, घटना होने पर फटकार जरूर लगाता है। ताजा मामला गाजियाबाद के सिहानी गेट थाना क्षेत्र नेहरुनगर में हुई कारोबारी रमन सरीन के यहां पड़ी डकैती का है। घटना होने पर मेरठ रेंज के आईजी प्रवीण कुमार और मेरठ जोन के एडीजी राजीव सब्बरवाल ने केवल संज्ञान ही नहीं लिया, बल्कि घटना स्थल का दौरा किया और बैठकें भी लीं। अफसरों को घटना का जल्द खुलासा करने का निर्देश भी दिया। जब पुलिस ने इस घटना का खुलासा कर दिया, असली मुल्जिम पकड़े गए, माल बरामद हो गया तो उसके बाद कोई भी बड़ा अफसर गाजियाबाद में पुलिसकर्मियों की हौंसला अफजाई (उत्साह बढ़ाने) करने के लिए नहीं आया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पहले अफसरों के दबाव में, वादी के दबाव में, व्यापार मंडल के दबाव में पुलिस घटनाओं का उल्टा-सीधा खुलासा कर देती थी, लेकिन अब देखने में आ रहा है कि असली खुलासे हो रहे हैं। इसलिए पुलिस टीम का उत्साह और पीठ थपथपाना तो अफसरों का बनता है, लेकिन कहीं ना कहीं यहां भी पुलिस अफसरों के बीच चल रही गुटबाजी दिखाई देती है जो काम करने वाली टीम के लिए भी कहीं ना कहीं अच्छा संकेत नहीं होता है। बहरहाल अगर पुलिसकर्मियों को लापरवाही पर डांट मिलती है, सजा मिलती है तो वहीं अच्छे काम होने पर उनकी पीठ भी थपथपाई जानी चाहिए।
– जय हिन्द।