गाजियाबाद नगर निगम की कल हुई बोर्ड की बैठक कई मायने में अहम रही। सबसे बड़ी बात कि गाजियाबाद के इस मुगल कालीन नाम को बदलने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास कर दिया गया। अब इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए शासन के पास भेजा जाएगा। यदि शासन से मंजूरी मिल गई तो अब इस जिले का नाम, गज नगर, गजप्रस्थ, दुधेश्वर नगर या हरनंदी नगर में से किया जा सकता है। इसके अलावा नगर निगम की दुकानों का किराया बढ़ाने को भी बोर्ड से मंजूरी मिल गई है। नगर निगम की दुकानों का किराया बढ़ाने का मामला भी राजनीतिक रूप ले चुका था। मगर नगर निगम बोर्ड ने इस विवाद पर पूर्ण विराम लगा दिया है। इस बोर्ड बैठक में सबसे महत्वपूर्ण जो रहा वह था पार्षद सचिन डागर और मेयर सुनीता दयाल के बीच हुआ वाक युद्घ। पार्षद सचिन डागर ने औद्योगिक क्षेत्र में पार्क की जमीन पर सडक़ बना देने का मामला उठाया। उन्होनें इसके एवज में रिश्वत लेने का आरोप भी लगा दिया। अब जैसी की मीडिया में खबरें आ रही हैं कि इस पर मेयर ने उंगली काट देने, गर्दन उड़ा देने जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, तो उस पर आपत्ति होनी चाहिए। एक गरीमामय पद पर बैठे किसी राजनेता की यह शब्दावली उचित नहीं हैं। आप अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए हिंसक टिप्पणी कैसे कर सकते हैं। दूसरी बात कि आखिर पार्षद सचिन डागर ने क्या गलत कह दिया या कर दिया? अगर पार्षद ही अपने क्षेत्र में हो रहे गलत कार्यों का विरोध नहीं करेगा, उसके विरूद्घ आवाज नहीं उठाएगा तो कौन यह सब करेगा? मेयर और नगरायुक्त पार्षद सचिन डागर से साक्ष्य मांग सकते थे, शिकायत और आरोप की जांच की बात कह सकते थे। पार्षद सचिन डागर के आरोप बहुत गंभीर हैं उनको इस तरह हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। पता चलना ही चाहिए कि आखिर वह कौन है जिसके कहने पर पार्क की जमीन पर सडक़ बना दी गई? कौन है जिसके कहने पर आरोपी थाने से छोड़ दिए गए? और कौन है जिस पर रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं? सचिन डागर के सवाल जायज हैं शहर को उनका साथ देना चाहिए।