२०१४ के लोकसभा चुनाव में जब अचानक जनरल वीके सिंह गाजियाबाद में भाजपा के टिकट पर चुनाव लडऩे आए थे तब लोगों ने कहा था कि एक जनरल चुनाव लड़ रहा है। हालांकि, २०१४ से लेकर २०१९ तक जनरल साहब जनरल ही रहे और उनका अंदाज नहीं बदला। जाहिर है लंबा समय उन्होंने एक ऐसी फोर्स में गुजारा जहां अनुशासन के अलावा कुछ नहीं और राजनीति में अनुशासन दूर तक नहीं, लेकिन फिर भी २०१४ में वो कई लाख वोटों से जीते। देश में मोदीजी के बाद उन्हीं की ही लीड थी और २०१९ में भी वो अच्छे वोटों से जीते लेकिन हर बार यही चर्चा होती थी कि वीके सिंह आज भी एक जनरल ही हैं। लेकिन अब २०१९ के चुनाव के बाद जो तस्वीरें और जो अंदाज उनका दिखाई देता है, उससे लोग अब यही कहने लगे हैं कि जनरल साहब अब राजनीति सीख गए हैं। हालांकि, २०१४ में भी जनरल साहब को यहां के नेताओं ने डराने की पूरी कोशिश की आप चुनाव हार जाओगे, लेकिन एक तो जनरल फिर ऊपर से ठाकुर वो डरने में नहीं आए, लाखों वोटों से जीते। २०१९ के लोकसभा चुनाव में भी उनके खिलाफ माहौल बनाया और भाजपा के वर्तमान चार जनप्रतिनिधियों ने दिल्ली में जाकर कई नेताओं के यहां उनको टिकट ना दिये जाने की मांग की लेकिन वो फेल हो गए और फिर एक बार जनरल जीत गए। अब इन तमाम चीजों ने जनरल साहब को जरूर राजनीति के गुर सिखा दिये। अब २०२२ का विधानसभा चुनाव आने वाला है। सबकी नजरें जनरल साहब पर हैं। क्षेत्रीय सांसद हैं जाहिर है, उनकी राय जरूर ली जाएगी। जनरल साहब ने उस सीट पर अपने पत्ते नहीं खोले जिस पर सबसे ज्यादा दावेदार हैं। हमेशा बड़े नेताओं से दूर रहने वाले राजेंद्र त्यागी ने भी जनरल साहब से आशीर्वाद मांग ही लिया। जनरल साहब ने मुस्कुराते हुए उनकी बात सुनी और उनको एक धार्मिक कहानी भी सुनाई। उसमें आशीर्वाद भी था और ये भी था कि जो समय पर होगा वही होगा। इतना ही नहीं इसी सीट पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बेहद खास व्यक्ति को भी जनरल साहब ने आशीर्वाद दे रखा है। इतना ही नहीं एक और परिवार जिसका संघ से हमेशा नाता रहा है, उसके युवा नेता को तो पूरा आशीर्वाद है। जाहिर है जनरल साहब का ये बदला हुआ अंदाज एक सुलझे हुए राजनेता का अंदाज दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं अब वो गांव के प्रधानों के नाम भी जान गए हैं। एक और विधानसभा के दावेदार को भी जनरल साहब ने एकतरफा आशीर्वाद दिया है। जबकि पार्टी किसी ओर के नाम पर विचार कर रही है लेकिन कहने वाले कह रहे हैं कि जनरल साहब का आशीर्वाद कुछ रंग दिखायेगा। बहरहाल, चर्चा ये भी है कि साहिबाबाद से भी कोई और नाम आ सकता है लेकिन अभी इसमें कोई दम दिखाई नहीं दे रहा है। बहरहाल, जनरल साहब का आशीर्वाद लेने के लिये अब वो लोग भी तैयार हैं जो कभी उनका विरोध करते थे। इस शेर के साथ अपनी बात को समाप्त करता हूं।
”दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों”