पहले नहीं पड़ती थी फिल्म स्टार्स के रोड शो की जरूरत
गाजियाबाद (युग करवट)। कुछ दशक पहले केवल पार्टी के नेता ही चुनावी सभा करके अपने प्रत्याशी का माहौल बनाते थे। इतना ही नहीं जिस प्रत्याशी को टिकट मिलता था उसका भी अपना एक अलग ही कद होता था। आज स्थिति ये हो गई है कि चाहे कोई भी दल हो वो फिल्मी दुनिया के लोगों का सहारा ले रहा है। बकायदा उनके रोड शो रखे जाते हैं। वो आकर प्रत्याशी के लिए वोट मांगते हैं। जबकि कई दशक पहले ऐसा कभी नहीं होता था। आखिरकार अगर प्रत्याशी के लिए फिल्मी दुनिया के लोग आएंगे तो फिर राजनीति की तस्वीर क्या होगी। फिल्मी पर्दे पर अपने अभिनय के जरिये लोगों को लुभाकर करोड़ों रुपये कमाने वाले लोग जब से राजनीति में आये हैं तब से राजनीतिक दल के लोग भी उन्हें इस्तेमाल करने लगे हैं।
दरअसल पहले पार्टी के बड़े नेता ही अगर आकर अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगते थे तो फिर किसी भी फिल्म स्टार की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज स्थिति ये है कि लोग सेलिबे्रटी के जरिये वोट मांगते हैं। इतना ही नहीं अब तो फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को बकायदा चुनावी मैदान में उतारा जाने लगा है। कई दशक पहले इलाहाबाद सीट से जब अमिताभ बच्चन चुनाव लड़े थे तब बहुत लंबी चर्चा हुई थी और उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया था। उसके बाद ना इलाहाबाद आये और ना ही कभी जनता के बीच तो फिर लोग ऐसे लोगों से दूर हो गये थे। लेकिन अब देखा जा रहा है कि एक बार फिर कुछ राजनीतिक दल फिल्म स्टारों के सहारे माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
फिल्म स्टारों के रोड शो में उमडऩे वाली भीड़ से ये अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वो वोट में बदलेगी या नहीं। क्योंकि भीड़ केवल स्टार को देखने के लिए आती है। पूरे देश में अब यही तस्वीर बन रही है कि बड़े राजनीतिक दलों के नेता भी फिल्म स्टारों को अपने यहां बुलाकर उनसे वोट की अपील कराते हैं। हालांकि अब तक का जो निचौड़ रहा है उसमें इनकी अपीलों का कोई खास असर नहीं देखा गया है।
फिल्म स्टारों के साथ धार्मिक गुरुओं की भी अपील अब चुनावी मौसम में कोई खास असर नहीं दिखाती। केवल एक बार एक धार्मिक गुरु की अपील का असर दिखाई दिया था जिसमें वीपी सिंह की सरकार केंद्र में बनी थी।
उसके बाद कभी भी कोई अपील सकारात्मक नहीं रही। दिल्ली में होने वाले चुनाव में एक बड़े धार्मिक गुरु ने एक राजनीतिक दल के लिए अपील की थी लेकिन तत्काल पार्टी ने वो अपील ठुकरा दी और साफ तौर पर कहा था कि हमें किसी भी धार्मिक गुरु की अपील या समर्थन की जरूरत नहीं है। दरअसल अब मतदाता बहुत ही होशियार हो गया है। कौन प्रत्याशी कितने पानी में है बाखूबी उसको अहसास रहता है इसीलिए मतदान से एक दिन पहले तक अब मतदाता अपनी जुबान नहीं खोलता। कई दशक पहले जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था और कोई चुनावी सर्वे नहीं होते थे तब भीड़ जो होती थी वो असली होती थी, वो असली समर्थक होते थे और उसी से बहुत कुछ अंदाजा लगा लिया जाता था। लेकिन आज स्थिति ये है कि भले ही किसी भी दल की रैली में या कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण नहीं होती कि ये उसके समर्थक है या विरोधी। आज स्थिति ये है कि मतदाता खामोशी मतदान वाले दिन तक रहती है और वो अपने पत्ते नहीं खोलती इसीलिए आखिर तक माहौल किसका बन रहा है ये अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल हो गया है।