चढ़ते हुए सूरज को सलाम
एक दशक पहले शायद ही किसी बाहर वाले को पता हो कि फलां नेता या फलां अधिकारी या फलां मंत्री का जन्मदिन है। घरवालों के अलावा बाहर वालों को कभी भी कोई जानकारी नहीं होती थी लेकिन बदलते आधुनिक दौर में अब अपने से ज्यादा दूसरे के जन्मदिन के बारे में ज्यादा जानकारी लोगों को होने लगी है। खासकर उन लोगों की जो चढ़ते हुए सूरज हैं। कहावत है कि चढ़ते हुए सूरज को सभी सलाम करते हैं, ये कहावत ही अब चरितार्थ हो रही है। जन्मदिन की मुबारकबाद देना अच्छी बात है इससे और आपस में समन्वय बढ़ता है लेकिन तीसरी आंख ने देखा कि अब जन्मदिन अब एक तरीके से शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी बन गया है। यदि किसी के जन्मदिन पर बधाई देने वालों की संख्या कम हुई तो उसका आंकलन भी लगाया जाता है और जिसके यहां ठीकठाक भीड़ हो गई तो मानो फिर तो कहा जाता है कि जलवा बरकरार है। किसी नेता के यहां अगर भीड़ ज्यादा है तो उसके कद का अंदाजा भी लगता है और किसी के यहां कम होती है तो कहा जाता है कि इसके दाने बिक गये। अजीब तस्वीर होती जा रही है। अब भीड़ से लोगों की ताकत का अंदाजा होता है। लेकिन ये भी देखने वाली बात होनी चाहिए कि आज के बदलते हुए दौर में सौ रुपये का बुका लेकर हर चेहरा एक ही जगह नजर आता है। चाहे वो मंत्री हो, चाहे सांसद हो, भले ही एक-दूसरे के खिलाफ बोलते हों लेकिन बुके लेकर जरूर पहुंच जाते हैं। तीसरी आंख ने देखा कि कौन आया, कौन नहीं आया इस पर भी चर्चा होती है। मतलब साफ है कि अब जन्मदिन भी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गया। ये भी आंकलन होता है कि चुनावी मौसम में किसके यहां भीड़ ज्यादा आयी और किसके यहां कम। तीसरी आंख ने देखा कि गाजियाबाद, नोएडा में बड़े नेताओं के जन्मदिन मनाये गये उनके कद का अंदाजा भी भीड़ से लगाया गया। बहरहाल, बदलते राजनीतिक तस्वीर में आप भले ही कितने बड़े नेता हों, आपका कितना बड़ा व्यक्तित्व हों अगर आपके यहां जन्मदिन या किसी अन्य कार्यक्रम में भीड़ नहीं आयी तो समझ लीजिए आपको लोग हल्के में ले रहे हैं। इसीलिए अब नेताओं के यहां से जन्मदिन को लेकर एक नहीं कई-कई लोग बुलाने के लिए लगाये जाते हैं। मानों जैसे कोई कंपनी अपने प्रोडेक्ट को लॉन्च करने के लिए अलग तरह से फोन कराती है ठीक उसी तरह से अब जन्मदिन के लिए आमंत्रित किया जाता है। यही आज की बदलती हुई तस्वीर है जिसका हिस्सा कोई एक नहीं सभी बन रहे हैं। जय हिंद