गाजियाबाद। फैमिली प्लानिंग योजना में कार्य करने के लिए तीन बार बेस्ट सर्जन का अवॉर्ड ले चुकीं, वर्तमान में जिला महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. संगीता गोयल के लिए यह शहर नया नहीं है। इसी शहर में पली-बढ़ी डॉ. संगीता गोयल ने यहां के मुरारी लाल स्कूल से प्राइमरी और फिर सुशीला इंटर कॉलेज से बारहवीं तक की पढ़ाई की है। इसके बाद मेडिकल में सेलेक्शन हो जाने के बाद, उन्होंने किंग जॉर्ज मेडिकल कालेज से एमबीबीएस और पीजी किया। जिस जमाने में लड़कियों को सिर्फ किताबी ज्ञान के लिए ही पढ़ाया जाता था, उस समय एक लडक़ी का डॉक्टर बनना आसान नहीं था, लेकिन न सिर्फ उन्होंने इस सपने को पूरा बल्कि अन्य लड़कियों के लिए भी मिसाल कायम की। पेश है गाजियाबाद की निवासी रहीं डॉ. संगीता गोयल से युग करवट की संवाददाता शोभा भारती के साथ खास बातचीत…
* लड़कियों की पढ़ाई को लेकर पहले अक्सर परिवार हिचकचाते थे, फिर आपने कैसे यह सफर तय किया?
यह बात सही है कि पहले लोग अपनी बेटियों को पढ़ाने से कतराते थे, लेकिन मैं अपने परिवार की पहली लडक़ी हंू, जिसने न सिर्फ उच्च शिक्षा प्राप्त की बल्कि डॉक्टर भी बनी। मेरी पढ़ाई के बाद मेरे अन्य भाई-बहनों ने भी उच्च शिक्षा प्राप्त की। मेरी पढ़ाई को लेकर मेरे परिवार विशेषकर मेरे दादा जी और फिर उनके बाद मेरे पिता और मां ने मेरा सपोर्ट किया। दादा जी हमेशा चाहते थे कि मैं उच्च शिक्षा प्राप्त करूं। कभी भी उन्होंने मेरी पढ़ाई में कोई रूकावट नहीं आने दी। परिवार के इस सपोर्ट की वजह से आज समाज में एक अच्छे सम्मानीय पद पर पहुंच सकी, जो किसी भी बेटी के लिए गर्व की बात हो सकती है।
* अपने ही शहर में, अपनों के बीच काम करना कैसा लग रहा है?
यह मेरा अपना शहर है, जहां मैं पली-बढ़ी हंू, बचपन बीता है और मेडिकल तक का सफर मैने यहीं के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर किया है। वर्ष १९९० में मेरी मेडिकल की पढ़ाई पूरी होने के बाद सरकारी सेवा में आ गई थी। उसके बाद विभिन्न पदों व जिलों रहकर सेवा करती रही, लेकिन जब मेरे अपने शहर में ट्रांसफर हुआ तो खुशी ही अलग थी। मेरी मां ने खुद ही यह जानकारी पूरे परिवार को दी। सबसे अधिक खुशी मेरी मां को मेरे वापस शहर आने पर हुई थी। परिवार के अन्य सदस्यों में भी खुशी का माहौल था। आज अपने शहर में अपनो लोगों की सेवा कर बेहद गर्व महसूस होता है। पुराने लोग मिलते हैं, जो बड़े गर्व से बताते हैं कि हमारे शहर की बेटी कितनी बड़ी डॉक्टर है। इतना ही नहीं मेरे साथ मेरे दोस्तों का भी मेडिकल में सेलेक्शन हुआ जिसमें डॉ. अरूणा अग्रवाल, डॉ. शशांक सिंघल, डॉ. मुकेश ग्रोवर, डॉ. सतीश त्यागी, डॉ. धीनेन्द्र सिंह शामिल रहे, आज वे लोग शहर में ही प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। उनके साथ मिलकर विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिससे अपने शहर के लोगों के लिए कुछ कर सकें। अपने लोगों की सेवा कर जो गर्व महसूस होता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
* आप एक लम्बे समय से सरकारी सेवा में हैं, क्या सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था में कुछ सुधार दिख रहा है?
पहले के मुकाबले अब सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो रही हैं। याद आता है कि पहले डॉक्टर के पास जरूरी संसाधन तक उपलब्ध नहीं होते थे। अस्पतालों के भवन जर्जर रहते थे, लेकिन अब सरकारी अस्पतालों में इफ्रास्ट्रक्टचर बदल रहा है। नई इमारतों के साथ ही आधुनिक उपकरण मौजूद हैं, आधुनिक नर्सरी है। मैं जिस अस्पताल में कार्यरत हंू, उसे शहर का सबसे बेहतर सरकारी अस्पताल माना जाता है। वहां अधिकतर सुविधाएं उपलब्ध हैं, समय के साथ बहुत चीजों में बदलाव आया है।
* मेडिकल क्षेत्र में क्या बदलाव देखने को मिला है?
मेडिकल क्षेत्र में भी काफी कुछ बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले डॉक्टरों को सीमित संसाधनों में ही मरीजों का इलाज करना पड़ता था, लेकिन अब डाइग्नॉस्टिक जांच होने से इलाज में आसानी हो गई है। यहां की समय से जांच होने पर गंभीर से गंभीर रोग की जल्द पहचान कर उसका इलाज कराया जा सकता है। पहले इस तरह की सुविधा न होने से दिक्कतें आती थीं। मगर मेडिकल में काफी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है जिससे समय से सटीक इलाज मरीजों का हो रहा है।
* सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं से अक्सर लोग नाराज रहते हैं, क्यो?
यह लोगों की अपनी-अपनी मानसिकता है जो आसानी से बदलने वाली नहीं है। अगर आप प्राइवेट अस्पताल और सरकारी अस्पतालों की स्थिति देखें तो दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। प्राइवेट डॉक्टर दिन भर में करीब ३० मरीज देखते हैं, जबकि सरकारी डॉक्टर को दिन भर में सौ से डेढ़ सौ मरीज देखने पड़ते हैं। उसके बाद ऑपेरशन, डिलीवरी सहित अन्य काम भी सरकारी डॉक्टर के जिम्मे रहते हैं। ऐसे में हर समय किसी भी मरीज के साथ नहीं खड़ा रहा जा सकता, लेकिन ऐसा नहीं है कि मरीजों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज नहीं मिलता। अगर ऐसा होता तो सरकारी अस्पतालों में इतनी भीड़ नहीं होती।
* मरीजों की यह भी शिकायत रहती है कि रात में उन्हें भर्ती करने के बजाए रैफर कर दिया जाता है, क्यों?
इसकी जानकारी अस्पताल के रिकॉर्ड आसानी से बता सकते हैं कि रात के समय स्टाफ कितना काम करता है, कितना नहीं। अस्पताल से किसी मरीज को तब तक रैफर नहीं किया जाता जब तक उसके इलाज की व्यवस्था न हो या मरीज अधिक गंभीर स्थिति में न हो। अस्पताल में सभी सुविधाएं उपलब्ध होने के चलते किसी को रात तो क्या दिन में भी रैफर नहीं किया जाता। कम संसाधनों में बेहतर सुविधाएं देने का प्रयास करते हैं, ऐसे में शिकायतें तो बनी रहेंगी।
* आज महिला सशक्तिकरण के बारे में बहुत कहा जाता है, कितने सार्थक हो रहे हैं यह अभियान?
महिला सशक्तिकरण सिर्फ एक बात नहीं बल्कि एक मिशन है, जो सार्थक होता दिख रहा है। इसी का नतीजा है कि आईएएस परीक्षा में पहले तीन पायदानों पर बेटियों का कब्जा है। महिलाएं हर क्षेत्र में कदम से कदम मिला रही हैं, लेकिन अब बेटियों के साथ-साथ अभिभावकों को बेटों को भी जागरूक करने का समय है। बेटों को समझाना होगा कि महिलाएं चाहे घर की हो या बाहर की, उनका सम्मान किया जाए। जिससे थोड़ा बहुत भेदभाव वह भी समाप्त हो जाए। शिक्षित करना बेहद जरूरी है, तभी समाज में जेंडर इक्वलिटी आ पाएगी।
* अक्सर महिलाओं के कार्यस्थल पर शोषण के मामले सामने आते रहते हैं, आपका क्या मानना है?
मेरी सर्विस को एक लंबा समय हो गया है, लेकिन भगवान का शुक्र है कभी मुझे इस तरह की परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा। हमेशा अपने साथ कार्यरत पुरूष अधिकारियों व कर्मचारियों का सहयोग मिला है। जिसकी वजह से मुझे कभी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। यही वजह है कि मैने काम करने को लेकर कभी असहज महसूस नहीं किया।
* आपके परिवार से क्या अन्य लोग भी मेडिकल क्षेत्र में आए हैं?
मैं अपने परिवार की पहली बेटी हूं, जो डॉक्टर बनी, लेकिन मेरे बेटा-बेटी मेडिकल के प्रोफेशनल से अलग हैं। बेटी बीटेक करने के बाद मुम्बई में सेटल है, तो वहीं बेटा भी पीएचडी कर रहा है। दोनों ही बच्चे मेडिकल प्रोफेशन से दूर है, लेकिन मेरा जुड़ाव हमेशा इस प्रोफेशन से रहेगा।