गाजियाबाद (युग करवट)। तीन दिन से जनता के वोटों से निर्वाचित भारतीय जनता पार्टी के पार्षद अपने साथी पार्षद सुधीर कुमार की गिरफ्तारी को लेकर आक्रोशित है। दरअसल, यादव दम्पति का खोखा हटाने और सिगरेट के पैसे नहीं दिये जाने के आरोप के बाद पुलिस द्वारा पार्षद के खिलाफ यादव दम्पति द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर की गई कार्रवाई को एकतरफा बताते हुए हंगामा कर रहे हैं। अगर देखा जाए तो पुलिस की कार्रवाई कहीं ना कहीं इस बात का संकेत भी है कि भाजपा सरकार में गरीबों की भी सुनी जा रही है। वरना इतनी जल्दी सुनवाई पहले की सरकारों में नहीं होती थी और खासकर जनप्रतिनिधियों के खिलाफ तो पिछली सरकारों में कम ही कार्रवाई होती थी। यादव दम्पति के जो आरोप है उसमें कितनी सत्यता है ये जांच का विषय है। लेकिन जो वीडियो पुलिस के पास है वो अपने आप में बहुत कुछ बयां कर रही है और उसी आधार पर पुलिस एक्शन में आयी।
ये भी सही है कि एक जनप्रतिनिधि के खिलाफ बिना जांच किये तहरीर के आधार पर तत्काल कार्रवाई करने से पहले कम से कम पुलिस को इस पूरे मामले से महापौर सुनीता दयाल को अवगत कराना चाहिए था। निगम सदन भी एक तरह से शहर की सरकार है और जनता द्वारा वोटों से चुनकर पार्षदों को सदन में भेजा जाता है। जिस तरह सांसद या विधायक की गिरफ्तारी से पहले सदन अध्यक्ष से अनुमति लेना होती है, इसमें भले ही अनुमति का प्रावधान ना हो लेकिन अगर पुलिस मौके की वीडियो महापौर को दिखा देती तो शायद महापौर भी इतना खुलकर नहीं आती और जो पार्षद हंगामा कर रहे हैं वो शायद नहीं होता। ये भी हो सकता है कि यादव दम्पति से अतिक्रमण को लेकर कुछ विवाद क्षेत्रीय पार्षद से चल रहा हो और इसको दबाने के लिए ये सबकुछ मुकदमेबाजी हुई हो। क्योंकि रात को दो बजे तक दुकान खुलने पर भी सवाल मेयर उठा रही है उसमें भी दम है। दुकान की आड़ में क्या कुछ हो रहा था ये जांच का विषय है। लेकिन पुलिस ने अच्छी बात है पीडि़त की तहरीर पर कार्रवाई की लेकिन जो धाराएं लगाई गई हैं उसको लेकर पार्षदों को ऐतराज है। लूट की धारा किसी को हजम नहीं हो रही है। कमिश्नरेट पुलिस की कार्रवाई को लेकर इस वजह से ज्यादा सवाल उठ रहे हैं कि बिना जांच करे लूट की धारा लगा दी। बहरहाल ये सब जांच का विषय है, लेकिन अपनी ही सरकार के खिलाफ अपनी ही सरकार में, भाजपा के ही जनप्रतिनिधि अगर सडक़ों पर उतरेंगे तो फिर क्या संदेश जाएगा। चुनावी माहौल में जहां दो चरण अभी बाकी रह गये हैं ऐसे में अगर भाजपा के लोग सडक़ों पर उतरकर अपनी ही सरकार की पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाएंगे तो फिर विपक्ष को जरूर एक मौका मिलेगा।
ऐसा नहीं है कि पहली बार ही भाजपा में उसके नेता या जनप्रतिनिधि सडक़ों पर उतरें हो। योगी सरकार में ही भाजपा के एक बड़े पदाधिकारी पुलिस कार्रवाई के खिलाफ सडक़ पर बैठ गये थे। उस समय भी तत्कालीन एसएसपी के खिलाफ जमकर नारेबाजी भाजपा द्वारा की गई थी। मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचा था। पुलिस के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं हुई थी लेकिन भाजपा के पदाधिकारी को अपने पद से हाथ धोना पड़ा था और कई ऐसे उदाहरण है जो अपनी ही सरकार के खिलाफ न्याय के लिए सडक़ों पर उतरने के हैं। अगर बिजली-पानी बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था और अन्य मुद्दों को लेकर भाजपा के जनप्रतिनिधि सडक़ पर उतरकर जनता की बात करें तो इसका एक अलग ही मैसेज जाएगा। ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि कोई सत्तारूढ़ दल का नेता इस तरह आंदोलन नहीं करता लेकिन कल जिस तरह पुलिस के खिलाफ नारेबाजी हुई, पुलिस से झड़पें हुई, जनप्रतिनिधियों को रोका गया, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि ये लोग सरकार का हिस्सा हैं। ऐसा लग रहा था मानो जैसे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ पुलिस करती है। इस तरह के चीजों से बचना चाहिए। क्योंकि चुनावी मौसम में सत्तारूढ़ दल के नेता आंदोलन करेंगे तो विपक्ष को एक मुद्दा मिलेगा। अपनी ही सरकार में और तरीके भी है बात रखने के और बात पहुंचाने के। महापौर श्रीमती सुनीता दयाल ने इस मसले को बहुत अच्छे तरीके से हैंडेल किया था कि क्योंकि वो निगम सदन की मुखिया हैं। पार्षदगण उनके परिवार के सदस्यों की तरह हैं, जाहिर है उन्होंने परिवार की मुखिया की तरह भूमिका निभाते हुए पुलिस के बड़े अफसरों को अपने यहां बुलाकर पार्षदों की पीड़ा भी बताई और अपनी नाराजगी का भी अहसास कराया लेकिन बाद में जो कुछ हुआ उसके पीछे कौन है ये भी समझने वाली बात है।