वाकई मोदी जी तुसी ग्रेट हो। देखो न सारे मुल्क को काम पर लगा दिया। जिसे देखो वही अब चीता पुराण बांच रहा है। क्या भक्त और क्या अभक्त, क्या मीडिया और सोशल मीडिया, क्या पक्ष और क्या विपक्ष सभी आपके एजेंडे के अनुरूप ही बात कर रहे हैं। राहुल गांधी भी कोई आदमी है और आजकल कोई यात्रा वात्रा कर रहा है अब किसी को याद नहीं। दो दिन में महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी की बात करना भी ओल्ड फैशन हो गया और सबकी ज़ुबान पर बस चीता और केवल चीता ही है। चीता भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि अफ्रीका के नामीबिया से लाकर मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया चीता। एक नहीं दो नहीं वरन पूरे आठ-आठ चीते। छोड़े भी क्या गए, बाकायदा गृह प्रवेश करवाया गया। बेशक खरीद कर लाए गए मगर जय जयकार इतनी हुई कि देवता भी शरमा गए होंगे। हो सकता है कि अफसोस भी कर रहे हों कि इवेंट के समय काहे आकाश से पुष्प वर्षा नहीं की।
मैंने जीवन में कभी जीता जागता चीता नहीं देखा है। हां डिस्कवरी चैनल पर उसे शिकार करते देखने की बात और है। मगर पिछले दो तीन दिन में टीवी, अखबार और सोशल मीडिया की बदौलत चीते के बाबत इतना जान गया हूं कि छोटी मोटी पीएचडी तो हो ही सकती है। यकीनन आप भी अब अपने से अधिक चीते को जानने लगे होंगे। भक्त मंडली के तो कहने ही क्या। उन्हें तो अब मुल्क की सभी समस्याओं का समाधान इन चीतों में ही नजऱ आने लगा है। हां उन्हें इस बात का जरूर मलाल है कि इस अवसर पर माननीय मोदी जी ने चीतों से जुड़ा अपने बचपन का कोई किस्सा क्यों नहीं सुनाया। बात भी ठीक है कि जो आदमी बचपन में मगरमच्छ पकड़ लेता था वह चीतों के साथ न खेला हो ऐसा कैसे हो सकता है। भगवा ब्रिगेड की भजन मंडली भी बहुत खुश है मगर उसे भी इस बात की कसक है कि सावरकर बुलबुल की बजाय चीते पर बैठकर अपनी मातृ भूमि के दर्शन करने क्यों नहीं आते थे। ख्वामखा बुलबुल के चक्कर में पड़ कर उनकी फजीहत करवा दी। गति के हिसाब से भी चीता बुलबुल से कहीं अधिक अच्छा रहता। उधर, शेर चीता लाया का राग अलाप राग रहे चेले चमाटे इस बात से खफा हैं कि टीवी एंकरों ने चीते जैसे कपड़े पहन कर कार्यक्रम को लाइव क्यों नहीं दिखाया। हालांकि हर समस्या का समाधान मोदी जी में ही खोजने वाले अब आश्वस्त हैं कि जब लुप्त चीते वापिस आ सकते हैं तो एक न एक दिन लुप्त विजय माल्या और नीरव मोदी जैसों को भी मोदी जी जरूर वापिस लायेंगे। उधर, विरोधियों की सबसे अलग कहानी है। उन्हें डर है कि ईडी और सीबीआई की तरह चीतों को भी उन पर छोड़ा जाएगा। शाकाहारियों का अपना राग है। उन्हें उन हिरणों और सांभरों की चिंता है जिनका शिकार चीते अब ऐसे करेंगे जैसे भाजपा अपने विरोधियों का करती है। सरकारी एजेंसियों के खौफ से भाजपा का भगवा पटका अपने गले में डालने वाले भी ईष्र्या से मरे जा रहे हैं कि हमसे अच्छा स्वागत तो इन चीतों का हुआ। हर बात पर नुक्स निकालने वाले ढूंढ ढूंढ कर फोटो शेयर कर रहे हैं कि चीते हवाई जहाज में और गऊ माता क्रेन में लटकी घूम रही हैं। किसी को लंपी रोग से मरने वाली लाखों गाएं याद आ रही हैं तो कोई पूछ रहा है कि जब कैमरे के शटर पर ढक्कन लगा हुआ था तो मोदी जी चीतों की फोटो कैसे खींच रहे थे। बाकि किसी और के बाबत क्या बताऊं, मैं खुद चार काम छोड़ कर आमने-सामने चीता पुराण बांच रहा हूं। वाकई मोदी जी तुसी ग्रेट ही हो।